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Thursday, June 14, 2012

बालतोड़ और चिदंबरम

साहब हमें अचानक बालतोड़ हो गया। बालतोड़ बड़ी अजीब तरह का फ़ोड़ा है। जो आदमी को ऐसी जगह हो जाता है।  कि कह भी नही सकता और सह भी नही सकता की स्थिती रहती है। लेकिन गर्भवती स्त्री का गर्भ और नेता के पाप की तरह फ़ुल स्टेज  आने पर इसे छुपाया नही जा सकता। साहब ये हिंदुस्तान ऐसा मुल्क है। जहां आवाज धीरे आने पर ही सामने वाला खैरियत पूछने लगता है। लेकिन बालतोड़ के मामले में आपका कितना भी खैर ख्वाह होगा। बालतोड़ और उसके होने वाली जगह का उचित संबंध जोड़ते ही मुस्कुरा उठता है। खैर साहब हुआ ऐसी जगह था कि महिला डाक्टर को नही दिखाया जा सकता था। कई लोग इस लाईन को पढ़ कर अपने कुत्सित मन में कुछ और समझ लेंगे। लेकिन साहब आप ऐसे नही है सो बताये दे रहा हूं कि हुआ जांघ पर है। अत्यंत पीड़ा में हमने सोचा कि इस पीड़ा का शमन कैसे किया जाये। आखिर बाल तोड़ सांसारिक कष्टो की तरह उपर वाले के द्वारा तय किये समय पर ही जान छोड़ता है।

 सो हमने श्रीमती से कहा- " सुनो प्रिये, आप हमारी अर्धांगिनी हो। भगवान से प्रार्थना कर हमारी आधी पीड़ा आप ले लो। कुछ क्षण विचार करने के बाद श्रीमती बोलीं - कल बाबा रामदेव टीवी पर कह रहे थे कि आदमी को अपने पापो का फ़ल खुद ही भुगतना पड़ सकता है। सो इस मामले में अर्धांगिनी वाला आप्शन काम नही कर सकता।" हमने कहा -"चलो कम से कम सिर की मालिश ही कर दो। पीड़ा से ध्यान बट जायेगा।" इतना सुनते ही श्रीमती ने करारा जवाब दे दिया -"हां घर मे चालीस नौकर बैठा रखे है श्रीमान ने कि वो घर के काम करें और मैं मुफ़्त बैठी सेवा करती रहूं।  गया पुराना जमाना  कि औरते अब गधा मजूरी करती फ़िरें।" हम भड़क गये- "हमको गधा कैसे कहा आपने। वाह रे कलजुग ये दिन भी आना बाकी था।" श्रीमती की तरफ़ से गोला आया -"लो हमने गधा कहा ही नही । पर अब जरूर सोच में पड़ गये हैं। आखिर जो मुहावरा न समझे वो लेखक गधा हुआ कि नही।"

 इतना सुन हम समझ गये, कि भाई श्रीमती से उलझ, पीड़ा कम करने की बात बनेगी नही। आखिर बालतोड़ के बदले दिलतोड़ का सौदा, मुनाफ़े वाला कहां हो सकता था। अचानक दिमाग में गाना बजने लगा -"दुनिया मे कितने गम है मेरा गम कितना कम है।" हमने सोचा वाह मियां, किसी ऐसे मामले पर विचार किया जाये कि अपनी पीड़ा कम लगने लगे। तो भी काम चल सकता है। पर फ़िर हमने सोचा कि बाल तोड़ जैसी भयानक  पीड़ा और कौन सी हो सकती है कि हिले तो भी दर्द न हिलो तो भी दर्द। बालतोड़ का मुकाबला बेशक बालतोड़ ही कर सकता है। फ़ेर हमने छोटे से दिमाग पर जबरदस्त जोर डाला- ’ हे मन, जल्दी बता कौन सबसे ज्यादा पीड़ित है। लौटती डाक से जवाब आया कि भाई कांग्रेसियों से ज्यादा पीड़ित आज कोई नही। फ़ेर हमने दिमाग लगाया के भाई सबसे अधिक कौन पीड़ित किये हुये है इन कांग्रेसियों को। पहले अन्ना, बाबा, ममता का ध्यान आया। फ़ेर हम सोचे, ये तो फ़ारेन पार्टिकल है, बाहरी तत्व है, गैर कांग्रेसी है। ये बाल तोड़ नहीं हो सकते। बालतोड़ तो शरीर का अंग होता है। ऐसा अभिन्न अंग जिसे आप चाह कर भी भिन्न नही कर सकते। समय आने पर ही टलेगा।

ऐसे में तो किसी पार्टी के आदमी को ही खोजना पड़ेगा। जो कांग्रेसियों को बालतोड़ की तरह का कष्ट दे रहा हो। बाल तोड़  की विशेषताओं पर गौर किया जाये। तो यह एक ऐसी मुसीबत है। जो रह रह कर रूक रूक कर असीम दर्द पैदा करती है। अब कांग्रेसियो को तो ऐसी पीड़ा चिदंबरम साहब ही दे रहे हैं। हर कुछ वक्त में उनका कोई न कोई नया लफ़ड़ा चला आ रहा है। जिस तरह बालतोड़ से छुटकारा पाना हमारे बस में नही। जब बालतोड़ का मन होगा तभी जायेगा। ठीक उसी तरह चिदंबरम साहब से छुटकारा पाना भी कांग्रेसियो के बस में नही। चिदंबरम साहब जब टलने की सोचेंगे, तब ही छुट्टी मिलेगा। हम अगर लोगो से कहे कि भाई ये प्यारा बालतोड़ हमारे शरीर का बहुत अच्छा सम्मानित कुलीग है। तब कोई भरोसा करेगा नही। ठीक वैसे ही मनमोहन सिंग जी के चिदंबरम साहब को, बहुत अच्छा सम्मानित कुलीग बताये जाने पर कोई भरोसा नही करता। अब नैतिकता के आधार पर जरूर उन्हे बालतोड़ करार दिया जाना अनुचित नजर आ सकता है। पर  साहब  जब नेताओं का नैतिकता से कोई लेना देना नही।  इस मुये बालतोड़ का भी नैतिकता से कोई लेना देना नही। तो हम काहे नैतिकता से नाता जोड़। अपने दर्द को कम करने का एक आसान जरिया जाया होने दें। वैसे भी आजकल उपमा देने की होड़ लग गयी है। आदरणीय मनमोहन सिंग को कोई शिखंडी कह रहा है, तो कोई धृतराष्ट्र। अब कोई कहे कि ’भाई ये तो पौराणिक चरित्र है।’ तो अपना बालतोड़ भी पीछे नही। जब से मनुष्य़ इस धरती पर जन्मा है। ये बाल तोड़ उसे दुखी करता ही आया है। बल्कि हम तो दावा करते है कि ये बालतोड़ दुनिया का सबसे प्राचीन पौराणिक कैरेक्टर है। बल्कि सोचते-सोचते, अब सोच रहा हूं।  कहीं ईश्वर की खोज इस बाल तोड़ के कारण ही तो नही हुई। इस बालतोड़ की भयानक पीड़ा में जब आदिमानव चीत्कारा होगा। तभी ईश्वर ने प्रकट हो, उसकी पीड़ा का शमन कर अपना परिचय दिया होगा। बल्कि सोच जाये कि आदिमानव को पढ़ना लिखना आता। तो आज आन रिकार्ड ईश्वर का नाम मौजूद होता। फ़िर हम लोग अलग अलग धर्मो में न बटे होते। और इन नेताओ को ऐसा सबक सिखाते कि नानी याद आ जाता।

ऐसे मे चिदंबरंम साहब को बालतोड़ कह देना, हमे किसी हिसाब से गलत भी नजर नही आता। और कांग्रेस की पीड़ा तो हमसे कई गुना ज्यादा है। हमारे बालतोड़ को  मीडिया दिखायेगा तो भी धुंधला स्क्रीन करके। कांग्रेस के बालतोड़ को तो दिन रात धांय धांय दिखाया जाता है। आठ दस स्व्यंभू विद्वानो की चर्चा कराई जाती है।  अब  चिदंबरम साहब की तरह हमारा बालतोड़ भी बयान दे सकता है। कि - " चाहे तो खंजर भोंक लो, पर मुझ मासूम बालतोड़ की नीयत पर सवाल मत उठाओ।" अब बालतोड़ को छूना ही नानी याद दिला देता है। तो कौन बलवान उसमे छुरा भोंक सकता है।  ऐसा सोच साहब हमारा दिल बाग बाग हुआ ही था। कि हमारा बालतोड़ जोर से लौंका। हमे लगा कि कह रह हों- ए दवे जी, हम भले बालतोड़ है। पर हमारी भी कोई इज्जत है कि नही।  ऐसे लोगो से हमारा संबंध जोड़ा, तो चेताये देते है।  सौ जन्मो में पीछा नही छोड़ेंगे।" चलिये साहब अब हम बालतोड़ की साख पर धब्बा न लगायेंगे। पर ध्यान रहे हमारे और कांग्रेस के बालतोड़ पर हंसियेगा मत। लोग कहते है कि जो बालतोड़ पीड़ित पर हंसा उसको बालतोड़ होना तय है।

Wednesday, May 30, 2012

लोकतांत्रिक महंगाई की जऽऽऽऽऽऽऽऽय हो

साहब  पिछले कुछ दिनो से देश में  मातम छाया हुआ है, कि हाय महंगाई से जीना हराम हो गया है। सुबह कंपूटर बाबा को चपको नही कि स्क्रीन पर मनमोहन से लेकर अमूल बेबी तक को कोसते लोगो की रेलमपेल है।  उसके बाद कोई सुकून का कोंटा  तलाशो, तो दना दन मैसेज आने लगते हैं - " पेट्रोल महंगा हो गया"  "फ़लां तेल कंपनी इतना प्राफ़िट छुपा रही है", "तेल इतने रूपये का आता है और साले टैक्स लगा के इतना मे बेच रहे हैं"। संघी लोग का तो और गजब है, वो हर चीज को हिंदुत्व पर छाये खतरे से जोड़ देते हैं। कब महंगाई को कोसना चालू करते है और कब  इसाई सोनिया से लेकर मुस्लिम आतंक पर उतर आते है कोई पता नही चलता।

मुझे समझ नही आती कि इस देश को  तकलीफ़ किस बात से है। मुझे तो यह महंगाई बेहद पवित्र नजर आती है। क्या खूब लिखा था किसी शायर ने के " सारे चिराग गुल कर दो कि आज अंधेरा बड़ा मुक्कदस है।" सो आज ये जो अंधेरा नजर आता है। बड़ा मुक्कदस है, क्योंकी ये जम्हूरी अंधेरा है। ऐसे ही ये महंगाई भी मुक्कदस है, क्योंकि ये जम्हूरी महंगाई है। इस दुर्गत के लिये हमने खुद दावत दी है।  मजे की बात है कि  लोकतांत्रिक दावत दी है। एक पौराणिक कहानी याद आ गयी कि जिसको पूरणमासी की रात में सांप ने डसा हो। वो हर पूरणमासी को सांप से फ़िर डस जाने का इंतजार करता है। ठीक वैसे ही हालत हम हिंदुस्तानियो की है। हर चुनावी पूरणमासी को हम इन सांपो से डसे जाने का इंतजार करते हैं।

अब आ जाईये इस  क्रोधित आम आदमी पर। यह आम आदमी बोले तो भारतीय मध्यम वर्ग। वह वर्ग जो सिनेमा देखता है, अखबार पढ़ता है, सामान का खरीददार है। और जिसके मूड को भांप कर ही यह बाजार भी बदलता है। गिराहक आखिर हिंदुस्तान में पौराणिक काल से देवता माना जाता है नही। सो इस आम आदमी के क्रोधित होने से मीडिया भी क्रोधित है और सिनेमा भी।  नेताओ से ज्यादा उसका क्रोध उन लोगो पर भी है। जिन्हे वो अमूमन   तीन रूपये किलो वाला चांवल पाकर मुटियाने वाला और काम से नागा करने वाला कामचोर आलसी गंवार कहता है। आखिर इस गरीब वर्ग से उसका ताल्लुक इतना ही है न कि वो उसके घर मे काम करने वाली बाईयो  या वो मजदूर जो उसके कारखाने, दुकान पर काम करता है। और यह गरीब कही से न्योता मिला नही कि चार दिन काम से गोल हो जाता है। इस आम आदमी की नजर में गरीबो को दिया जाने वाला चावल शराब की भेंट चढ़ जाता है। यह गरीब आदमी आम आदमी के क्रोध का शिकार इसलिये है कि उसके अनुसार  ये साले दारू साड़ी लेकर इन चोर नेताओ को वोट देकर जिता देते हैं। आम आदमी अपनी बैठको में जब राजनैतिक चर्चा करता है तो इन गरीबो की वोटिंग को लेकर कसमसाता जरूर है।


लेकिन इस पवित्र महंगाई का कारण गरीब नही है। गरीब का तो पेट ही खाली है, वह कहा आंदोलन के महंगे शौक पाल सकता है। उसके आंदोलनो को टीवी पर दिखायेगा कौन। आंदोलन कर तो ये आम आदमी ही सकता है जिसका पेट भरा हुआ है। पर  इनको महंगाई से ज्यादा चिंता अपना अपना वाद पेलने की है। और भ्रष्टाचार से लड़ने के बजाये अपनी दुश्मन नजर आने वाली पार्टी को ठेलने की है। सुबह से शाम हाय हाय मचाते इन आम आदमियों में से कोई भाजपाई है तो कोई कांग्रेस और  कोई वामपंथी विचारधारा का है। व्यवस्था के खिलाफ़ उठते हर आंदोलन में यह आम आदमी अपने वाद के सुर खोजता है। कोई धर्म के कारण किसी वाद का समर्थक है। कोई विचारधारा के कारण। और कॊई कोई तो खानदानी विरासत मे पाये वाद को अपने बच्चो तक पहुंचाने को ही पूर्वजो का कर्ज चुकाने का माध्यम समझते हैं। और भारत मे ऐसे लोगो की भी कमी नही जो पैदाईशी विरोधी लाल होते हैं। सो हर उठने वाले आंदोलन की मौत भी तय ही है। बच वह तभी सकता है। जब उसके सीने में सवार कोई राजनैतिक दल हो। और ऐसा होने पर सवारी साधता राजनैतिक दल माल उड़ाने का उत्तम अवसर पा जाता है। और आम आदमी फ़िर से बेचारा महंगाई का शोक मनाता है।

तो साहब  यह बेचारा आम आदमी....न तो श्रेष्ठी वर्ग की तरह संपन्न ..न ही गरीबों की तरह निर्द्वन्द ,,,इन दोनों के बीच पट में पिसने वाला यही आम आदमी है। .इसे समाज की दिशा भी बदलनी है..और  अपनी गृहस्थी को भी सुचारू रखना है। उस पर ये  लोकतान्त्रिक क्रोध और वर्तमान व्यवस्था के प्रति कसमसाहट । इस कसमसाहट को अभी एक उबाल का जरूरत है। शोषण की भट्टी में क्रोध का कोयला तपेगा।   लेकिन यह तभी संभव होगा जब वह वाद के विवाद को  धर्म के चश्मे को एक तरफ़ फ़ेंक सिर्फ़ और सिर्फ़ व्यवस्था और लचर कानून के विरोध मे बिना किसी राजनैतिक दल के उठ खड़ा होगा। और तब ये  २८ रूपये दिहाड़ी कमाने वाला गरीब शायद उस सोच को जी सके। जहाँ सिर्फ एक दिन की दारू,कपडा,चंद रूपये या खाना..उसको देश की दिशा तय करने में लोभ पैदा करके  बाधा न बने। तो साहब महंगाई को कोसने वालो इंतज़ार करिए कि इस आम जन के लोकतान्त्रिक  क्रोध  की तपिश बढे ......और उबले एक नयी क्रांति  के लिए।