Wednesday, February 20, 2013

ग से गधा, क से काटजू


आदरणीय काटजू जी


देखिये काटजू साहब गधे गाते नही है। हालांकि गधों का गाना उनका संवैधानिक अधिकार है जिसे किसी भी अदालत में चैलेंज नही किया जा सकता। परंतु जिस तरह नयी बहू से ससुराल मे सर झुका कर रहने की उम्मीद रखी जाती है उसी तरह गंधो से भी चुप रहने की उम्मीद की जाती है। मै किसी भी प्रकार से आपकी और गधो की तुलना नही कर रहा हूं। लेकिन गधा शब्द आजकल ’हाट’ है। काहे कि यू पी सरकार ने ग से गणेश को संप्रदायिक मानते हुये उसके स्थान पर ग से गधा पढ़ाने का आदेश दिया है। अब चूंकि क से कमल भ से भाजपा  का चुनाव चिन्ह है तो उसे तो संप्रदायिक मानने के पूरे कारण मौजूद है। अतः क से काटजू भी पढ़ाया जा सकता है। बच्चो को समझना भी आसान होगा। क्योंकि आज कल आप सारे न्यूस चैनलो में, अखबारो में, फ़ेस बुक में हर मामले मे अपनी राय देते पाये  जाते है।

दूसरी ओर गधा शब्द इस लिये भी प्रासंगिक है कि संवैधानिक पदो पर बैठे लोगो से गधो की तरह संयमित व्यहवार की उम्मीद की जाती है। जिस तरह गधा अपने मालिक द्वारा दी गयी जिम्मेदारी के अलावा दाये बाये का काम नही कर सकता वैसे ही संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्तियों से भी संविधानप्रदत्त जिम्मेदारी के अलावा किसी भी तरह की एक्टिविटी में शामिल न होने की उम्मीद की जाती है।  हालांकि गधे और ऐसे व्यक्ति को आफ़ टाईम मे अपन समय का सामाजिक उपयोग करने की इजाजत होती हैं। खैर आप जैसे फ़ाजिल आदमी के बारे में कुछ कहना अनुचित सा लग सकता है पर माननीय काटजू जी दो कारणो से आपका व्यहवार मुझे खल रहा है।

पहला कि आप सुप्रीम कोर्ट के भूतपूर्व न्यायाधीश है। यदि आपके कद का व्यक्ति ही सुप्रीम कोर्ट और उसके द्वारा बनाई गयी एसआईटी की पड़ताल और निर्णय का सम्मान नही करेंगे। तो फ़िर आप जिस प्रेस काउंसिल आफ़ इंडिया के अध्यक्ष है उसके अंतर्गत आने वाले पत्रकार से किस तरह की उम्मीद रखी जा सकती है?  क्या आपका यह मानना है कि भारत में न्याय नही होता? और अगर भारत मे न्याय नही होता है या न्याय होता प्रतीत नही होता तो आपको मोदी के बजाये न्याय व्यवस्था पर बात करनी चाहिये। अगर  मोदी अपराधी होकर भी बेदाग निकलने मे सफ़ल हो चुके है तब मोदी नही यह न्याय व्यवस्था अपराधी है। आखिर किस तरह दो हजार लोगो का कातिल बच निकला।  फ़िर यदि कोई अपराधी निर्दोष छूट सकता है तो  निर्दोष लोगों को भी सजा हुई होगी। इसके अलावा भी कई सवाल उठाये जा सकते हैं।  मसलन आरोप यह है कि मोदी के निर्देश पर पुलिस मूक दर्शक बन गयी।  जब निर्देश देने वाला कातिल है तो उसके इस असंवैधानिक निर्देश का पालन करने वाले उससे भी बड़े अपराधी है। क्या जाकिया जाफ़री समेत दुनिया तमाम के मानवाधिकारियों मे से किसी ने भी किसी भी दोषी अफ़सर के खिलाफ़ किसी भी अदालत मे कोई याचिका लगाई है? और यदि नही लगाई तो 90 % मूर्ख भारतीयो की श्रेणी मे कौन आता है मोदी या उनपर आरोप लगाने वाले लोग।

हालांकि आपके शेष दस %  बुद्धिमानो की श्रेणी मे होने के बारे में मुझे कोई संदेह नही है और इसका संवैधानिक आधार भी है कि सिर्फ़ विद्वान लोग ही भारत के उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश और उसके बाद प्रेस काउंसिल का अध्यक्ष लगाया जाता। वैसे प्रेस काउंसिल के चेयरमैन रहते हुये आपके दायरे मे वह मीडिया है जो पिछले कई सालो से सतत मोदी के खिलाफ़ अभियान चलाये हुये है।  अगर गुजरात के वनवासी इलाकों में विकास नहीं हुआ, आदिवासियो पर अत्याचार हो रहे है, जमीने छीनी जा रही है,  सौराष्ट्र की सड़के नाली आदि आदि इत्यादी सब कंडम है तो क्यों नहीं मीडिया उसको कवर करता। वहां के स्थानीय भाजपा नेता को खड़ा कर क्यो नही जनता के सामने सवाल पूछ पोल खोलते। ठीक है कि मोदी को हराने मे मीडिया असमर्थ है पर उसके शासन की पोल खोलने से कम से कम  सुधार का दबाव तो बना सकता है आदिवासियो की समस्याए दूर करवा सकता है। वैसे भी हजार साल की गुलामी में रहने वाले देश का कोई राज्य महज  15 सालों में अमरीका का कैलिफ़ोर्निया प्रांत  बन जाये यह कमाल रजनीकांत के अलावा किसी के बस में नही।

आप यह मत समझियेगा कि संवैधानिक पद का हमे कोई अनुभव नही है। देखिये हम खुद भी पति परमेश्वर के संवैधानिक पद पर बैठे है। जिस तरह मोदी की बढ़ती लोकप्रियता आपको खल रही है। उसी तरह हमारे पड़ोस मे रहने वाली सुंदरियो के पति हमको खलते है। हमारा भी मन कहता है कि हम उन सुंदरियो को उनके पतियो के चंगुल से छुड़ा ले ठीक उसी तरह जिस तरह आप इस देश को मोदी से बचाना चाहते है। लेकिन जैसे हम अपने पद के कारण विवश है आपको भी आपकी विवशता का ध्यान रखना चाहिये। हालांकि हम जानते है कि जिस तरह हम अपनी श्रीमती का मोह नही छोड़ पा रहे, ठीक उसी तरह आप भी अपनी कुर्सी का मोह नही छोड़ पा रहे है।

खैर साहब नैतिकता का तकाजा था कि आप और मैं अपने से असंबधित मामलो पर लेख न लिखते। आपने लिखा दुनिया समझ गयी  मैने लिखा है तो आशा करता हूं आप भी मेरी बात समझ जायेंगे।

आपका अपना 

अरूणेश सी दवे "राम भरोसे" 
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2 Comments

2 comments:

  1. सार्थक , उच्चे पदों पर वैठे लोग अपनी गरिमा को भूलते जा रहें है |

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