Friday, January 14, 2011

बाघ का अर्थशास्त्र

Jan 8, 2011



Photo by: Arunesh C Dave
बाघ संरक्षण का आर्थिक पहलू
आज भारत मे बाघो के संरक्षण को लेकर काफ़ी जागरूकता आ गयी है । और हर किसी के पास उनको बचाने के लिये एक अलग विचारधारा है । लेकिन देश मे इस दिशा मे  कार्य कर रहे अधिकांश प्रबुद्ध वर्ग एक विचार मे सहमत नजर आता है कि बाघो और आदमियो के बीच दूरी बनाना ही संरक्षण का एक मात्र उपाय है । इसी कड़ी में  आगे मेरे मित्र अजय दुबे जो  मध्यप्रदेश के एक अग्रणी पर्यावरण कार्यकर्ता है ने उच्च न्यायालय मे एक याचिका दाखिल कर राष्ट्रीय उद्यानो के कॊर क्षेत्र मे पर्यटन पर रोक लगाने की मांग की गयी है । इस याचिका के निर्णय से बाघो और राष्ट्रीय उद्यानो के आसपास रहने वाले वनवासियो के भविष्य पर गहरा असर पड़ सकता है । बाघो के संरक्षण के लिये उसके आर्थिक पक्ष पर भी गंभीर विचार करने की आवश्यकता है ।


आज भारत मे कान्हा बांधवगढ़ रणथमबौर जैसे प्रसिद्ध राष्ट्रीय उद्यानो के आस पास रहने वाले आदिवासियो के जीवन स्तर मे अच्छा सुधार हुआ है । बड़ी तादाद मे सैलानियो के आने से इन आदिवासियो को नये रोजगार प्राप्त हुए है गाईड से लेकर होटलो के कर्मचारी तक मे इनको बड़ी तादाद मे नौकरिया मिली हैं । इन ग्रामवासियो के लिये बाघ जीविकोपार्जन का आधार बन गया है । इसके अच्छे परिणाम बाघो के संरक्षण मे प्राप्त हुये हैं आज इन गावों के आसपास किसी भी तरह का शिकार आसान काम नही रहा । बाघो पर आधारित रोजगार होने के कारण ग्रामीण इनके संरक्षक हो गये है ।

जब कान्हा से बाघिन को पन्ना स्थानांतरित करने का आदेश दिया गया तब स्थानीय ग्रामवासियो ने हड़ताल कर दी और राष्ट्रीय उद्धान का प्रवेशद्वार बंद कर दिया  अधिकारियो को उन्हे समझाने के लिये कड़ी मशक्क्त करनी पड़ी । ग्रामवासियो का तर्क था कि यदि कान्हा से बाघो को कही और भेजा जायेगा तो बाघ कम हो जायेंगे और पर्यटको का आना भी कम हो जायेगा इससे वे बेरोजगार हो जायेंगे ।

 इसके अलावा भी बाघो की एक झलक की तलाश मे घूमते पर्यटक जंगल पैट्रोलिंग का काम भी करते हैं । प्रसिद्ध राष्ट्रीय उद्यानो के चितपरिचित बाघो की अनुपस्थिती मालूम पड़ जाती है और किसी बाघ के १०-१५ दिनो तक नजर ना आने पर किसी भी बाघ की तलाश चालू हो जाती है एवं किसी बाघ के घायल नजर आने पर वनविभाग तक खबर पहुंच जाती है और उस बाघ को तत्काल चिक्त्सीय सहायता मिल जाती है । वनविभाग पर भी अंकुश बना रहता है और उसके द्वारा बरती किसी भी लापरवाही की सूचना तत्काल मीडिया तक पहुच जाती है । चाहे कान्हा मे शिकारियो के फ़ंदे मे फ़सी बाघिन हो या बांधवगढ़ मे झुरझुरा बाघिन की मौत हो यदी ये मामले पर्यटको की निगाह मे नही आये होते तो वनविभाग कब का इन्हे गुमनामी के अंधेरे मे दफ़न कर चुका होता ।


लेकिन कोर क्षेत्र मे पर्यटन का दूसरा पहलू भी है जिसको लेकर अजय दुबे जैसे लोगो की चिंता वाजिब भी है । राष्ट्रीय उद्यानो के कुछ चुनिंदा क्षेत्रो मे वाहनो की संख्या अत्यधिक बढ़ गयी है जिससे वन्य प्राणियो के आवास क्षेत्र मे खलल पड़ने लगा है एक एक बाघ के दिख जाने पर दसियो गाड़िया उसके पीछे लग जाती हैं और उनके व्यहवार मे परिवर्तन नजर आने लगा है इससे बचना भी जरूरी है व्यहवार मे परिवर्तन आने के घातक परिणाम भी हो सकते है बचपन से ही पर्यटको के आदी हो चुके बाघो मनुष्य से दूरी बनाये रखने की स्वभाविक प्रवुत्ती छोड़ देते है हाल ही मे बांधवगढ़ के ताला गांव मे एक बाघिन अपने शावको के साथ घुस आती है और सामना होने उसने आदमियों पर हमला करना भी प्रारंभ कर दिया है । ऐसे शावको के बड़ा होने पर उनका व्यहवार कैसा होगा इसका अदांजा लगाना कठिन नही है । हालांकि वनविभाग ने इसके लिये कदम उठाए हैं और वाहनो की संख्या कॊ नियंत्रित करने का प्रयास किया है । पर एक बात और भी है जिस पर ध्यान दिया जाना अत्यंत आवश्यक है बाघ पर्यटन का लाभ कुछ चुनिंदा उन गांवो को ही मिल रहा है जिनमे  प्रवेश द्वार है राष्ट्रीय उद्यानो से लगे शेष गांव इससे अछूते है ।

राष्ट्रीय उद्यानो से लगे गांवो मे रहना हम शहरियों को रोमांचकारी लग सकता है पर उन ग्रामीणो को नही जो उनमे निवास करते हैं खेतो की उजड़ी फ़सल या किसी गाय का मारा जाना उसके भी उपर प्रियजनॊ की मौत इन मे से हर एक कारण किसी को भी बाघ का हत्यारा बना सकती है मुझे या आपको भी यदि इससे हमारे बच्चो को भूखा सोना पड़े या बच्चे ही ना रहे पर यह बात जुदा है हम और आप इस परेशानी से दूर हैं यदी आप पंचम बैगा के पिता होते जो हाल ही मे बांधवगढ मे बाघिन के हमले मे मारा गया है तो शायद आप बाघ संरक्षण के बारे मे सोच भी  नही सकते थे खासकर तब जब उस जंगल से आपको धेला भी नही मिलता हो यह बात ठीक है कि मुंबई या दिल्ली की आराम दायक जिंदगी मे बाघो पर बात करने के लिये पैसा नही लगता और यदि लग भी जाये तो फ़िर भी हमारा अस्तित्व इससे प्रभावित नही होता है  लेकिन यह बात जंगल से लगे गांव मे करना बेमानी है और वह भी तब जब इस जंगल से गांववालो को कुछ मिलना ही नही हो । किसी सम्मेलन मे कम्प्यूटर पर  या मीडिया मे बाघ संरंक्षण की बाते करना अलग बात है और  खेत मे मचान मे बैठ कर  वन्यप्राणियो को भगाने के लिये हल्ला करना , सुबह उठकर हुआ नुकसान जांचना , या अपने मरे हुए पशु को देखना  और हर नुकसान से आपके जीवन पर इसके पड़ने वाले  प्रभाव को झेलना अलग बात है |

मुख्य सवाल जो आज मुह बाये खड़ा है वह यह है कि क्या कोर क्षेत्र मे पर्यटन रोकने से गांव वालो को आर्थिक नुकसान होगा , यदि यह पर्यटन चालू रहे तो बाघो उनके रहवास क्षेत्र व्यहवार और पर्यावरणतंत्र को कितना नुकसान होगा , पर्यटन रोकने से बाघो की सुरक्षा मे क्या कॊई कमी आयेगी और क्या लाभ मिलना बंद हो जाने से ग्रामीण फ़िर बाघ विरोधी हो जायेंगे , क्या कोर क्षेत्र मे पर्यटन बंद होने के बाद वनविभाग वहां बखूबी ??? काम करता रहेगा

जो भी व्यक्ती भारत की कानून व्यवस्था से वाकिफ़ है वह यह जानता है कि किसी भी प्रकरण को मनचाहे जज तक पहुचाने की व्यवस्था हो ना हो अनचाहे जजो से दूर ले जाने की व्यवस्था तो है ही ऐसे मे जिस भी जज के पास यह प्रकरण जायेगा वह पर्यावरण का कितना जानकार है हितैषी है या नही और ऐसी अन्य कई बाते हैं जिनकी चर्चा करने पर जेल भी हो सकती है और मै अरूंधती राय की तरह पहुंच वाला आदमी भी नही हूं । अतः मै यही कह सकता हूं कि इस प्रकरण के फ़ैसले मे पर्यावरण की हार तो है ही पर कुछ जीत भी है किसी भी व्यवस्था के अनूरूप चलने पर भी मुख्य समाधान तो दूर ही है ।



मुख्य बात तो यह है कि बाघो के संरक्षण मे संरक्षित वनो से लगते हर गांव को जोड़ना होगा   और जोड़ने का मतलब यह नही कि उनको भाषण पिलायें या कंबल बाटे य क्रिसमस मनायें मतलब यह है कि उनको उस जंगल से ऐसा लाभ होना चाहिये कि वे अपने नुकसान को नजर अंदाज कर सके पहले यह नुकसान प्राक्रुतिक जंगल से मिलने वाले भोजन से पूरा हो जाता था पर अब हमने जीवन शैली को मोड़ दिया है और फ़ल और फ़ूलदार पौधो को खत्म कर दिया है और तो और उन्ही जंगलो मे सदियो से रहते आये वनवासियो का जंगल से अधिकार भी समाप्त कर दिया है ऐसे मे नुकसान की पूर्ती केवल पर्यटन से पूरी हो सकती है मुवाअजो की थाल न कभी सजी है और न कभी सज पायेगी । और शहरी धनकुबेरो होटल मे वनवासी नौकर हो सकता है संतुष्ट नही ।


 क्यों न जंगल की सीमा से लगते हर गांव मे एक सुंदर विश्राम ग्रह बनाया जाय जिसका मालिकाना हक ग्राम वासियो का हो और उस हिसाब से ही प्रवेश निर्धारित हो क्यो ना जंगल मे जाने वाली हर जिप्सी एक अलग वनवासी परिवार की हो क्यों न गॊरूमारा राष्ट्रीय उद्धान की तरह हर शाम बाहर निकलने वाले वाले पर्यटको को अलग अलग गांवो से बाहर निकाला जाय और हर उस गांव मे वनांचल का नाच दिखाया जाय और प्रवेश शुल्क से इसकी राशी वसूली जाय और क्यो ना लाभ हर उस गांव को मिले जिसे जंगल से नुकसान होता है । और तो और क्यों न जंगल मे जगह जगह मधुमक्खी पालन किया जाय जब सुंदरवन मे लोग इसके लिये जान की बाजी लगाने को तैयार है तो हमारे पास तो करॊड़ो एकड़ वनभूमी है । हालांकि यह बात भी सही है कि उत्पादन वनमंडल की वनभूमी शहरी लोगो का सागौन साल उगाती है आदिवासियो वन्यप्राणियो और मधुमक्खियों के भोजन स्त्रोत सेमल बेल जामुन आंवला इमली करौंदा जाम आम कटहल गंगाइमली बेर मुनगा  महुआ  सल्फ़ी चिरईजाम पीपल बरगद नीम पलाश यह सब पौधे उत्पादन वनमंडल के क्षेत्र मे उगाये नही जाते और राष्ट्रीय उद्धानो मे शायद किसी ने रोक लगा रक्खी है कि ना काटो ना लगाओ खैर साहब कहा सुना माफ़ करना फ़ैसला भी सामने आ जायेगा और नतीजा भी
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  1. बधाई हो कि आप ब्लाग धारक हो गये

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  3. yahi bat ager raman sing jaise logo ko samajh me aajay wo to power plant lagane me lage hai. unhe power aur pase ka nasha hogaya hai .jabki asli jindgi natural resorces me hai. hamere yaha house bricks\semant me bante hai jabki wastern contrys me wooden hote hai....log paise k nashe me aur devlopment k name per prakriti se khilwad kar rahe hai.

    dave mere dost likhte raho.

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (16-06-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ...!

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