Wednesday, March 20, 2013

संविधान बिछाओ - सेक्स करो


भारत के नेताओं,  धर्म रक्षको, बुद्धीजीवियों से पूछा जाये - "क्यों जी बलात्कार पर आपकी क्या राय है।" तो सारे ऐसी घोर निंदा करेंगे कि  सारे बलात्कारी राम सिंग टाईप आत्महत्या कर लें। पर जैसे ही पूछा जाये कि- "क्यों जी बलात्कार कैसे रूकेगा।" वैसे सारे के सारे  अलग अलग सुर मे राह अलापने लगते है। 

कुछ के जवाब देखिये -

हिंदु संस्कृती रक्षक -  " बलात्कार इंडिया में होते है भारत में नही। गाय पालने से चरित्र निर्माण होगा और चरित्र निर्माण से ही बलात्कार रूक सकता है। " ( बयान के चंद ही दिनो के भीतर सूदर अंचल निपट भारत छत्तीसगढ़ के एक गांव मे गुरू जी आठ वर्ष की क्षात्राओं से बलात्कार करते पकड़ाया। गुरू जी के घर मे तीन गाय और एक बैल दशकों से बंधा हुआ था। नीम पर केरला यूं कि वहां सरकार भी हिंदु धर्म रक्षको की है। )


इस्लाम धर्म रक्षक -"  औरतो को बलात्कार से बचने के लिये बुरके मे रहना चाहिये। एक इस्लामिक मुल्क के मौलवी ने छह महिने की बच्चियो को भी बुर्का पहनाने का फ़तवा जारी किया।"

(चंद महिने पहले ही पाकिस्तान मे एक शख्स कब्र से निकाल महिलाओ के शव से बलात्कार के आरोप में पकड़ा गया। याने कब मे कफ़न ताबूत मे बंद महिला सुरक्षित नही है लेकिन उसे बुर्का भी पहना दिया जाता तो शायद बलात्कार नही होता।)  


खैर कड़ी से कड़ी सजा और उससे भी कड़े कानून पर सारे एक मत हैं। बल्कि मै तो सोचता हूं कि भारत का संविधान ही  थानेदार, वकील, कोर्ट बाबू और न्यायाधीशों के न्याय मंडल की जिंदगी चलाने के लिये बनाया गया है। कोई बवाल मचा नही  कि इन लोगो के तरकश मे एक और तीर पहुंचा दो। कर्तव्य की इतिश्री, जनता खुश, न्याय मंडल प्रसन्न। पीड़ित पक्ष या निरपराध व्यक्ती पिसता रहे, अपराधी थमाये पैसा और चैन की जिंदगी बसर करे। अब एक से एक कानून बन रहे है। मसलन घूरने पर सजा, पीछा करने पर सजा,  सोलह साल की उम्र मे सेक्स करना अपराध। याने जो लड़का लड़की शारीरिक आकर्षण से मोहित होकर समाज को, लाज शर्म को, बदनामी के डर को ताक पर रख के सेक्स करने का राजी हो गये है क्या वे संविधान को नीचे बिछा कर सेक्स नही करेंगे? हर विज्ञापन मे औरत के शरीर के बल पर माल बेचना अपराध नही है?  उस विज्ञापन से सेक्स की तरफ़ आकर्षित होकर सेक्स करना अपराध है। या साथ मे मनमोहन का बच्चो के नाम संदेश भी प्रसारित करना चाहिये-

मनमोहन सिंग  (प्रधान मंत्री आफ़िस से भारत का झंडा बाजू मे उनके जैसा मुरझाया हुआ) - "बच्चो अठारह के पहले सेक्स से दूर रहना हर जिम्मेदार भारतीय बच्चे का फ़र्ज है। आप को इस समय अपनी सारी ताकत सेक्स के बजाये पढ़ाई, खेल- कूद में लगाना चाहिये। ठीक है।


अब घूरना कानन को देखिये, कौन तय करेगा कि घूर रहा था कि नही? या कोई लड़की कह दे कि दवे जी घूर रहे थे तो दवे जी को टांग दोगे। अदालतो मे पहले ही करोड़ो केस धूल खा रहे है दस बीस लाख और बढ़ जायेंगे। मै तो सोचता हूं कि सामने वाली मिसेज रूनझुन मुझ पर घूरने का केस दर्ज करवा दे तब क्या होगा?

न्यायाधीश - " क्यों जी आपने  मिसेज रूनझुन को घूरा है कि नही।"

दवे जी - " घूरा नही है माई बाप,  देखा है।"

न्यायाधीश - "साफ़ साफ़ कहो जी क्या लंबे समय तक देखा है।"

दवे जी - " जी माई बाप मै उन पर मोहित हो गया था।"

न्यायाधीश - " मतलब अपराध स्वीकार करते हो।"

दवे जी - " मै मजबूर हो गया था माई बाप। रसीले लाल होंठ, झील सी नीली आंखे, लहराते केश, गोरे मुखड़े पर तिल। कसम से माई बाप एक दम द्वादशी का देवी रूप लग रही थी। मै देखते देखते मंत्र पढ़ रहा था - "या देवी सर्व भूतेशू सुंदरी रूपेण संस्थितः"  वाला।

न्यायाधीश - " यह अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि अपराधी निर्दोष है घूर जरूर रहा था लेकिन पवित्र भावना से। अतः केस खारिज किया जाता है।"


दूसरा केस स्टडी देखिये- कमला ने  कमल उपर पीछा करने का आरोप लगाया

न्यायाधीश - " क्यों जी आपने  कमला का पीछा किया है कि नही।" "

कमल     -  "पीछा तो किया है माई बाप।"

न्यायाधीश - " मतलब अपराध स्वीकार करते हो।"

कमल    - "माई बाप आप भी तो कभी जवान रहे होगे आपका भी तो दिल किसी के उपर आया होगा। आप ने भी तो लाईन मारी होगी।  आप ही कहो कि बिना लाईन मारे पीछा किये कोई लड़की हां बोलती है क्या। मुहब्बत की खातिर सच बोलिये माई बाप वरना इश्क  का खुदा आपको कभी माफ़ नही करेगा।"

न्यायाधीश -  " बेटा कह तो सही रहे हो पर हमारे जमाने मे यह अपराध नही था। तब की बात और थी अब महिलायें आजाद हो गयी है पीछा करने से बुरा मनाती है। सरकार ने कानून बना दिया है मेरे हाथ बंधे हुये हैं। "


कमल   -    " हुजूर अगर मै अपराधी हूं तो यह कमला भी अपराधी है। क्यों ये मैचिंग बिदी जींस टाप पर्स पहन कर घूमती थी। क्या इतनी हसीन लगने पर कोई इससे   इश्क न कर बैठेगा भला।  माई बाप अगर मै ’पीछा’ कानून का अपराधी हूं तो यह दफ़ा 120 b  की अपराधी है इसने साजिश रच, हसीन बन मुझे अपने पीछे पड़ने को  मजबूर किया।"  

कमला -     " यह झूठ है माई बाप मै मैचिंग मैचिंग अपने अंदर कांफ़ीडेंस जनरेट करने के लिये पहनती हूं नाकि खूबसूरत लगने के लिये।" 

न्यायाधीश - " कमल बेटा मै न्याय के हाथो मजबूर हूं अतः  तुम्हे   इंडियन पीछा कानून के तहत दो साल कैदे ए बामुशक्कत की सजा सुना रहा हूं। साथ ही मै दिल के हाथो  भी मजबूर हूं सो तुम्हारी जमानत मै खुद लेता हूं"।


यह तो था काल्पनिक विचार पर वास्तविकता में होना क्या चाहिये ? अमेरिका आदि में किसी लड़की को किसी लड़के के व्यहवार से परेशानी हो तो वह अदालत मे जाकर उस लड़के के खिलाफ़ पतिबंधात्मक आदेश पारित करवा सकती है। इस अदालती आदेश से प्रतिबंधित लड़का यदि फ़िर ऐसी हरकत करे तो पुलिस में सूचना देकर उसे रंगे हाथो पकड़वाया जा सकता है या ऐसे भी उस लड़के को अदालत में पेश होना होता है। यह वह सरल तरीका है जिससे किसी निर्दोष को फ़साना भी असंभव है साथ ही लड़्कियो को पूर्ण सुरक्षा भी मिल जाती है। लेकिन हमारे देश मे सरल कमाई हीन तरीको की जरूरत किसे है? जैसे वैवाहिक विवाद मे मध्यस्थता कराने की व्यवस्था की गयी है ऐसे ही महिला छेड़ छाड़ के केस मे भी ऐसी मध्यस्थता से दोनो के परिवारो को आमने सामने बैठा मामले कि सुलझाया जा सकता है। इसने वो कानूनी आधार भी बन जाता है जिसके उल्लंघन के बाद लड़के को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिये। इसके अलावा अधिकांश गंभीर मामलो में आरोपी मानसिक रोग से ग्रस्त रहता है। उसे तत्काल मनोचिकित्सा की आवश्यकता होती है। इस पक्ष को छोड़ दिया जायेगा तो अपराधी एक के बाद एक महिलाओ की जीना हराम किये ही रहेगा। लेकिन अपने यहां पीछा कानून और घूरना कानून जैसे सर्व शक्तिमान अस्त्रो के होते हुये इन सब बेकार की बातो के लिये समय आखिर है किसके पास।


खैर साहब सुंदरियो को देखना हर मर्द का जन्म सिद्ध अधिकार है। मै इस अधिकार के लिये तमाम उम्र लड़ता  ही रहूंगा। पीछा करने की तो मेरी उम्र रही नही, शादी शुदा आदमी को वैसे पीछा करने की जरूरत भी नही पड़ती। बीबी के पल्लू मे ही सारा संसार होता है।  आंख बस बंद करने की देरी है, श्रीमती मन चाही हीरोईन में कन्वर्ट हो जाती है। 

Thursday, February 28, 2013

हा राम - हे राम सेतु


परिवार के बड़े बुजुर्गो से मैं बड़ा नाराज हूं साहब।  बचपन में "राम रक्षा स्त्रोत" जाप करना सिखाये  "राम फ़ायदा स्त्रोत" सिखाये होते तो आज मै कहां का कहां पहुंच गया होता। वैसे मुझे अपनी भी अकल लगानी चाहिये थी। जब प्रभु  के छू मात्र देने से पत्थर तक जी उठता है। उनकी शरण मे जाने से सारे पाप धुल जाते है तो उनके नाम से भाजपा की तरह मै भी तर गया होता। बाबरी मस्जिद आंदोलन से मिला रामनामी प्रसाद बेचारो को रह रह कर याद आता है तो उनकी कोई गलती भी नही। मै तो सोचता हूं कि पिछली बार जब सत्ता पाये थे तो संसद का नाम राम संसद काहे नही कर दिये। हारते ही नारा लगा देते "सौगंध राम की खाते है राम संसद कब्जायेंगे"। भारत की भोली भाली जनता तुरंत नतमस्तक हो राम मंदिर टाईप चंदा भी देती और वोट देने में तो खैर पैसा भी नही लगता।

अब इनको मौका लगा है राम सेतु का। क्या हुआ जो अटल जी की सरकार ने  राम सेतु से नहर बना समुद्री मार्ग खोलने का फ़ैसला किया था। अरे भाई गलती हर किसी से होती है, अब अटल जी से गलती हुई तो इसका मतलब थोड़े कि नराधम कांग्रेस उसका बहाना बना कर श्रद्धेय रामसेतु को तोड़ दे। राम सेतु परियोजना का नाम आते ही हर संघी आज कल भावविह्वल हो  मृत्यु शय्या पर पड़े दशरथ की तरह  "हा राम" चीत्कार उठता है।   ऐसा लगता है कि जाने माने राम सेतु टूट गया तो ये  उपर जाकर भगवान राम को क्या मुंह दिखायेंगे।  भगवान अपना सेतु न बचा पाने के अपराध से कुपित होकर इनको सीधा खौलते तेल के कड़ाहे मे फ़ेंकवा देंगे। आप ही सोचिये कि बाबरी मस्जिद गिराने के संचित पुण्य से स्वर्गाधिकारी हो चुका हर संघी स्वर्ग  में विजय माल्या टाईप सुरा सुंदरी में तर होने का टिकट पा चुका था अचानक अपने नर्क मे धकेले जाने की संभावना से कितना हकबकाया हुआ होगा। कल तरूण विजय का राज्य सभा में भाषण सुनते समय मुझे लगा रहा था कि अब धार धार रोये कि तब।

अच्छा मै तो कोई वैज्ञानिक नही हूं शुद्ध राम भक्त हूं। जिसको शंका हो वह आकर मुझसे धारोधार रामरक्षा स्त्रोत रामचरित मानस का पाठ सुन सकता है। अब उम्र के इस पड़ाव पर मै कम्युनिस्ट भी नही हो सकता। जहां कोई कष्ट हुआ नही कि मुंह से आप ही आप "हे राम निकल: जाता है। और राम भक्त होने के नाते मै इन को शास्त्रार्थ पर भी आमंत्रित कर चुका हूं कि भाई रामसेतु ये है ही नही। पहली बात तो नल नील ने राम लिख कर चट्टान पेड़ आदि को समुद्र मे तैराया  था। सो रामसेतु पानी में तैरने वाला सेतु था जमीन से जुड़ा हुआ नहीं।  यह भौगोलिक संरचना राम सेतु हो ही नही सकती। दूसरे लंका विजय के बाद विभिषण ने प्रभु से विनती की - "प्रभु श्री राम यह सेतु मेरे राज्य पर सतत खतरा बना रहेगा, आपके नाम के प्रभाव के कारण इसे नष्ट भी नही किया जा सकता। केवल आप ही इसे नष्ट कर सकते है।" इस पर प्रभु श्री राम ने इस सेतु को नष्ट कर दिया था। स्वयं बाल्मिकी रामायण मे यह स्पष्ट दिया हुआ है। लेकिन  संघियो और उनके बाबू जी मोहन बैटरी को तो दिल्ली फ़तह करना है वे तो गधे को भी बाप बना सकते है। एक सज्जन हमसे बोले  कि भले ये वो राम सेतु नही पर राम उसी रास्ते से लंका गये थे सो वह हमारे लिये पूजनीय है। हमने कहा फ़ेर अयोध्या से लेकर लंका तक पूरा रास्ता पूजनीय हुआ कि नहीं। काहे रेलवे लाईन, रोड, नहर बनने दिये, भाजपा शासित राज्यों मे बना रहे हो?  वे सज्जन खसक लिये।


दिल्ली फ़तह करना भी कॊई बुरी बात नही हम भी चाहते है कि इस बार कांग्रेस से छुटकारा मिले। पूरे देश के मध्यमवर्ग में नरेन्द्र मोदी की लहर है, आज तक कभी किसी भाजपा के नेता के लिये ऐसा जन समर्थन भी नहीं था।  ऐसा भी नही है कि दूसरे राजनैतिक दल इस तरह की चालबाजिया नहीं करते। लेकिन जब मामला देश की सुरक्षा से जुड़ा है, श्रीलंका के दक्षिणी छोर पर चीन का बंदरगाह आ रहा है हमारा पूरा समुद्री यातायात उसके नियंत्रण मे आ जायेगा। ऐसे में राम सेतु से नहर निकाल पूरा समुद्री यातायात अपनी सीमा से होकर ले जाना कितने रणनीतिक, आर्थिक फ़ायदे की चीज है यह तो सोचना चाहिये। चलो उसके बाद भी किसी को लगे नही राम सेतु नही टूटना चाहिये तो भी कोई बुरी बात नहीं। सुप्रीम कोर्ट मे केस लगा दिया गया है अपना वकील लगाओ दलीलें तथ्य सामने रखो, जो फ़ैसला आयेगा वह सबको मान्य। लेकिन नहीं अब देश भर मे प्रोपोगेंडा मे लग गये है खुद की सरकार आ गई तो फ़िर कैसे बना पायेंगे?  कोई वैक्ल्पिक मार्ग भी बताते है भाई लोग जिसमे  हजारो करोड़ अतिरिक्त खर्च आयेगा।पहले ही देश आर्थिक संकट से जूझ रहा है याने फ़िर इनकी चुनावी तिकड़म का नुकसान देश झेले। खैर अभी भी बीच का रास्ता निकाला जा सकता है। ये कांग्रेसी लोग का भी गलती है।  हर चीज का नाम महात्मा गांधी  के नाम से कर देते है। अरे भाई ठीक है महात्मा गांधी देश के बापू  है हम भी बापू मानते है। पर बाज लोग दूसरो को बापू मानते है उनकी भावनाओ का भी तो खयाल रखो भाई। सबको अपना अपना बापू मानने का संवैधानिक अधिकार  है। इतना सब नाम अपने मन का रख लिया अब एक नाम उनके मन का भी हो जाये। आप प्रस्तावित तो करो कि राम सेतु से होकर निकलने वाली समुद्री नहर का नाम गोड़से नहर होगा फ़िर देखिये कैसे  आम सहमति बन जाती है। उनका नाम हो जायेगा देश का काम हो जायेगा।

Sunday, February 24, 2013

निर्मल बाबा वाटरप्रूफ़


अति आदरणीय निर्मल बाबा को न्यूस और मनोरंजन चैनलो पर फ़िर लोगो की पीड़ा का शमन करते देख मुझे भगवान भोले नाथ पर बड़ी दया आई। वैसे भोले बाबा ही इसके लिये जिम्मेदार भगवान होंगे ऐसा मेरा पूर्ण विश्वास है।  वेद और पुराण गवाह है कि भगवान भोलेनाथ का अपने सरल स्वभाव के कारण अपात्र लोगो पर भी दया कर उन्हे वरदान देने का पुराना ट्रैक रिकार्ड है। एक बार किसी असुर को दुश्मन के सर पर हाथ रखते ही उसे भस्म कर देने का वरदान दे दिया था। उस पापी असुर ने जटाशंकर पर ही वरदान अजमाने का ठान लिया। वो तो भला हो नारायण विष्णु का, जिन्होने मोहिनी रूप धारण कर असुर का हाथ उसके ही सर पर रखवा दिया तब जाकर  शंकर भगवान चैन का सांस लिये थे। सो निर्मल बाबा को भी वही वरदान दिये होंगे और निर्मल बाबा  भोलेनाथ को उनके भक्तो  के घर से निकालने की कसम खा लिये है। पिछला बार बवाल मचने के पहले हम महादेव घाट के शिव मंदिर मे सात सौ ईक्कीस पिंडिया गिने थे। इस बार पता नही कितने और घरो से महादेव निकाला हो जायेगा।

वैसे निर्मल बाबा को देश के आदर्श बाबा के खिताब से नवाजा जाना चाहिये। काहे कि ऐसा वाटर प्रूफ़ देश भक्त टैक्स उ बाबा इस देश में कोई नही। इस देश के बाबा लोग तो भगवान के नाम पर लिप सर्विस का पैसा लेते है। भुगतान को दान का नाम देते है। और बिना कोई टैक्स पटाये देश का प्रधानमंत्री कौन हो इस मामले पर कुंभ से फ़तवा जारी कर देते हैं। याने चोरी त चोरी और फ़ुल सीना जोरी। अपने निर्मल बाबा न तो बाबा रामू की तरह काला धन पीलाधन आंदोलन करते है न आशा बापू राम की तरह पत्रकारो को पिटवाते, भक्तो को लात मारते है। किसी भी तरह की राजनीती से खुद को कोसो दूर रखते है। दायें बायें की बात भी नही करते दारू मत पियो, बुर्का पहनो, लड़कियो राक बैंड मत चलाओ टाईप  अंदरूनी मामलो में दखलंदाजी भी नही करते। दलित आदिवासी, स्वर्ण, ईसाई, मुसलिम  का भेदभाव भी नही। और न ही किसी भी भगवा, हरा रंग का लबादा ओढ़ अपने श्रद्धेय होने का अहसास दिलाते है।

अब तो उन्होने एक नया आदर्श स्थापित किया है। उनका मानना है कि वे भक्तो को सर्विस दे रहे हैं। तो वे हर भक्त से सर्विस टैक्स भी जमा करवा रहे हैं। अब सोचिये कि जब अकेले निर्मल बाबा इस सरकार को एक करोड़ रूपया इनकम टैक्स और बारह लाख रूपया सर्विस टैक्स की आमदनी महज तीन महिने में करवा सकते है। तो कुंभ के मेले में प्रधानमंत्री चुनने एकत्र हुये सारे बाबा कितने का रेवेन्यू जनरेट कर सकते है। इसमे तमाम रामायण गीता सुनाने वाले बापूओ को जोड़ दिया जाये तो मामला खरबों में पहुंच जायेगा।  अगर तिरुपती से लेकर वैष्णव देवी और साई बाबा से लेकर सत्य सांई बाबा मंदिर को एड कर दिया जाये त मामला शंख, नील
तक पहुंचने की संभावना है। इन पैसों से देश मे नाथूराम गोड़से स्वर्ण भारत योजना लागू की जा सकती है। अजमेर की दरगाह से लेकर हाजी अली तक, मदरसो से लेकर मस्जिदों को जोड़ने पर तमाम पसमंदा दबे कुचले मुसलमानो की तबीयत हरी की जा सकती है। दीनी मदरसो में तालीम देने वाले तमाम मौलवियों के घर लेटेस्ट टेक्नोलाजी का एसी फ़िट किया जा सकता है। अगर इस्लाम में एसी हराम हो तो भी कश्मीर वाले मुफ़्ती से फ़तवा लेकर किसी और टेक्नालाजी की सुविधा फ़रहाम की जा सकती है। कुछ बुखारियो को बुखार और पशमीना बाबा को पसीना जरूर छूट सकता है पर ये लोग ही त खुद को धर्म रक्षक, देश रक्षक बताते है। फ़िर देश को पैसा देने में हर्ज क्या। और पूरा दान थोड़े न कोई मांग रहा है, केवल इनकम टैक्स, सर्विस टैक्स काट लिया जायेगा। आखिर जब ये लोग भगवान और अल्लाह की सेवा में लगे ही हुये है। त सेवा कर देने मे क्या हर्ज हो सकता है भला। (चर्चो से मिल सकने वाले धन को जोड़ नही पाया हूं। काहे कि इतना बड़ा कैलकुलेशन करने वाला कैलकुलेटर नही था। इसे मेरी क्षद्म धर्मनिरपेक्षता हरगिज न समझा जाये।)

और इन राजनैतिक दलो को भी तो थोड़ा सोचना चाहिये। ये न्यूस वाले निर्मल बाबा को इतना बदनाम कर रहे है ये लोग कुछ दखल देते नहीं। अरे सोचिये तो जिस आदमी के कहने से करोड़ो लोग टीवी के सामने काला पर्स खोल कर बैठ जाते है तो क्या फ़लां छाप पर मुहर लगाने से लाभ होगा कहने से एकतरफ़ा वोटिंग नही हो सकती। और टैक्स पटाने के लिये जब अमिताभ बच्चन सचिन तेंदुलर का विज्ञापन दिखा सकते हो तो निर्मल बाबा तो देश हित मे मुफ़्त मे भी काम करने तैय्यार हो जायेंगे।  इन स्वयंभू चौथे स्तंभ के लोगो से भी पूछना चाहता हूं। आखिर क्या बिगाड़ा था निर्मल बाबा ने एड दे रहा था। अब प्रिंट मीडिया वालो को नही मिला त भाई मांग लेते जो बाबा एक साथ आठ न्यूस चैनलो मे अपने समागम दिखा सकता है उ क्या सौ पचास अखबारो को एड नही दे देता। और जरा सोचो कि निरमल बाबा कही प्रेस कांफ़्रेस कर आरोप लगा दिया कि खुद नीम-हकीम- खतरा- ए- जान का रोज विज्ञापन छापते हो, लिंगवर्धक यंत्र का प्रचार कर लोगो को बरगलाते हो  और हमारे को बदनाम करते हो तो क्या जवाब दोगे भाई। याने "निर्मल बाबा बैरी संपादक प्यारा बताओ पत्रकारिता अपराध हमारा" टाईप का सवाल दागा जा सकता है।


खैर साहब इन बाबाओ मुल्लाओ नेताओ सरकार और पत्रकारो से तो हमे हमारी सलाह माने जाने की कोई उम्मीद नही। पर हम आपको एक नेक सलाह मुफ़्त मे दे रहे है। किसी ऐरे गैरे बाबा के पास जाने से निर्मल बाबा के पास जाना सबसे अच्छा। काहे कि ज्योतिष के पास जाओगे त कालसर्प से लेकर भंयकर मंगल, शनी अमंगल बता देगा। दुनिया तमाम के रत्न -पूजा-यज्ञ करवा देगा। हजारो का चंदन लगेगा और समय खोटी हो वो अलग। इससे अपने निर्मल बाबा कितने बेस्ट है, एंट्री फ़ीस जरूर थोड़ी महंगी है पर उसके बाद बहुत ही सस्ता उपाय बता देते है। गोलगप्पा से लेकर सवा किलो पेड़ा तक झट पट किया नही कि रूकी हुई किरपा फ़ुल स्पीड से आपके पास आना शुरू।  अभी पैसे नही तो बस टीवी से ही पर्स खोल किरपा ले लो पर्स भरने के बाद डाईरेक्ट किरपा लेने एपाइंटमंट। याद रखो भाईयो सस्ता रोये बार बार महंगा रोये एक बार।

Wednesday, February 20, 2013

ग से गधा, क से काटजू


आदरणीय काटजू जी


देखिये काटजू साहब गधे गाते नही है। हालांकि गधों का गाना उनका संवैधानिक अधिकार है जिसे किसी भी अदालत में चैलेंज नही किया जा सकता। परंतु जिस तरह नयी बहू से ससुराल मे सर झुका कर रहने की उम्मीद रखी जाती है उसी तरह गंधो से भी चुप रहने की उम्मीद की जाती है। मै किसी भी प्रकार से आपकी और गधो की तुलना नही कर रहा हूं। लेकिन गधा शब्द आजकल ’हाट’ है। काहे कि यू पी सरकार ने ग से गणेश को संप्रदायिक मानते हुये उसके स्थान पर ग से गधा पढ़ाने का आदेश दिया है। अब चूंकि क से कमल भ से भाजपा  का चुनाव चिन्ह है तो उसे तो संप्रदायिक मानने के पूरे कारण मौजूद है। अतः क से काटजू भी पढ़ाया जा सकता है। बच्चो को समझना भी आसान होगा। क्योंकि आज कल आप सारे न्यूस चैनलो में, अखबारो में, फ़ेस बुक में हर मामले मे अपनी राय देते पाये  जाते है।

दूसरी ओर गधा शब्द इस लिये भी प्रासंगिक है कि संवैधानिक पदो पर बैठे लोगो से गधो की तरह संयमित व्यहवार की उम्मीद की जाती है। जिस तरह गधा अपने मालिक द्वारा दी गयी जिम्मेदारी के अलावा दाये बाये का काम नही कर सकता वैसे ही संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्तियों से भी संविधानप्रदत्त जिम्मेदारी के अलावा किसी भी तरह की एक्टिविटी में शामिल न होने की उम्मीद की जाती है।  हालांकि गधे और ऐसे व्यक्ति को आफ़ टाईम मे अपन समय का सामाजिक उपयोग करने की इजाजत होती हैं। खैर आप जैसे फ़ाजिल आदमी के बारे में कुछ कहना अनुचित सा लग सकता है पर माननीय काटजू जी दो कारणो से आपका व्यहवार मुझे खल रहा है।

पहला कि आप सुप्रीम कोर्ट के भूतपूर्व न्यायाधीश है। यदि आपके कद का व्यक्ति ही सुप्रीम कोर्ट और उसके द्वारा बनाई गयी एसआईटी की पड़ताल और निर्णय का सम्मान नही करेंगे। तो फ़िर आप जिस प्रेस काउंसिल आफ़ इंडिया के अध्यक्ष है उसके अंतर्गत आने वाले पत्रकार से किस तरह की उम्मीद रखी जा सकती है?  क्या आपका यह मानना है कि भारत में न्याय नही होता? और अगर भारत मे न्याय नही होता है या न्याय होता प्रतीत नही होता तो आपको मोदी के बजाये न्याय व्यवस्था पर बात करनी चाहिये। अगर  मोदी अपराधी होकर भी बेदाग निकलने मे सफ़ल हो चुके है तब मोदी नही यह न्याय व्यवस्था अपराधी है। आखिर किस तरह दो हजार लोगो का कातिल बच निकला।  फ़िर यदि कोई अपराधी निर्दोष छूट सकता है तो  निर्दोष लोगों को भी सजा हुई होगी। इसके अलावा भी कई सवाल उठाये जा सकते हैं।  मसलन आरोप यह है कि मोदी के निर्देश पर पुलिस मूक दर्शक बन गयी।  जब निर्देश देने वाला कातिल है तो उसके इस असंवैधानिक निर्देश का पालन करने वाले उससे भी बड़े अपराधी है। क्या जाकिया जाफ़री समेत दुनिया तमाम के मानवाधिकारियों मे से किसी ने भी किसी भी दोषी अफ़सर के खिलाफ़ किसी भी अदालत मे कोई याचिका लगाई है? और यदि नही लगाई तो 90 % मूर्ख भारतीयो की श्रेणी मे कौन आता है मोदी या उनपर आरोप लगाने वाले लोग।

हालांकि आपके शेष दस %  बुद्धिमानो की श्रेणी मे होने के बारे में मुझे कोई संदेह नही है और इसका संवैधानिक आधार भी है कि सिर्फ़ विद्वान लोग ही भारत के उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश और उसके बाद प्रेस काउंसिल का अध्यक्ष लगाया जाता। वैसे प्रेस काउंसिल के चेयरमैन रहते हुये आपके दायरे मे वह मीडिया है जो पिछले कई सालो से सतत मोदी के खिलाफ़ अभियान चलाये हुये है।  अगर गुजरात के वनवासी इलाकों में विकास नहीं हुआ, आदिवासियो पर अत्याचार हो रहे है, जमीने छीनी जा रही है,  सौराष्ट्र की सड़के नाली आदि आदि इत्यादी सब कंडम है तो क्यों नहीं मीडिया उसको कवर करता। वहां के स्थानीय भाजपा नेता को खड़ा कर क्यो नही जनता के सामने सवाल पूछ पोल खोलते। ठीक है कि मोदी को हराने मे मीडिया असमर्थ है पर उसके शासन की पोल खोलने से कम से कम  सुधार का दबाव तो बना सकता है आदिवासियो की समस्याए दूर करवा सकता है। वैसे भी हजार साल की गुलामी में रहने वाले देश का कोई राज्य महज  15 सालों में अमरीका का कैलिफ़ोर्निया प्रांत  बन जाये यह कमाल रजनीकांत के अलावा किसी के बस में नही।

आप यह मत समझियेगा कि संवैधानिक पद का हमे कोई अनुभव नही है। देखिये हम खुद भी पति परमेश्वर के संवैधानिक पद पर बैठे है। जिस तरह मोदी की बढ़ती लोकप्रियता आपको खल रही है। उसी तरह हमारे पड़ोस मे रहने वाली सुंदरियो के पति हमको खलते है। हमारा भी मन कहता है कि हम उन सुंदरियो को उनके पतियो के चंगुल से छुड़ा ले ठीक उसी तरह जिस तरह आप इस देश को मोदी से बचाना चाहते है। लेकिन जैसे हम अपने पद के कारण विवश है आपको भी आपकी विवशता का ध्यान रखना चाहिये। हालांकि हम जानते है कि जिस तरह हम अपनी श्रीमती का मोह नही छोड़ पा रहे, ठीक उसी तरह आप भी अपनी कुर्सी का मोह नही छोड़ पा रहे है।

खैर साहब नैतिकता का तकाजा था कि आप और मैं अपने से असंबधित मामलो पर लेख न लिखते। आपने लिखा दुनिया समझ गयी  मैने लिखा है तो आशा करता हूं आप भी मेरी बात समझ जायेंगे।

आपका अपना 

अरूणेश सी दवे "राम भरोसे" 

Sunday, January 27, 2013

संविधान हाय हाय


साहब गणतंत्र दिवस की सुअवसर पर कई गणमान्य गणो के सुविचार जानने का सुअवर सोशल मीडिया ने जबरन प्रदान कर दिया। कोई केजरीवाल की फ़ुटवा चपकाये संसद सांसद संविधान को कोस रहा था। तो कोई "मेरा नेता चोर है" बैनर लगाये फ़िर रहा था। उनके हिसाब से जो संविधान बलात्कारियो अपराधियो भ्रष्ट लोगो को संसद मे चुने जाने की छूट प्रदान करे वह बिल्कुल बेकार है। कईयों का सीना निरीह आदिवासियो पर घनघोर अत्याचार करने वाले पुलिस अधिकारियो को पदक मिल जाने से छलनी था। तो कई बिकनी ए खास को फ़िल्मजगत मे आम करने वाली अभिनेत्री को पदम पुरूस्कार मिलने से भड़के हुये थे।

कुल मिला कर इस क्रोध के मंजर ए आम में आपस में दुश्मनी रखने वाले अनेक समूह अनेकता मे एकता की अद्भुत मिसाल दे रहे थे। दिल्ली में बलात्कार के विरोध प्रदर्शन मे पिटे हुये आंदोलन कारियों को दूर से पहचाना जा सकता था। आंसू गैस के गोले फ़ायर करती, डंडा भाजंती पुलिस का फ़ोटू इनका कामन ट्रेडमार्क मालूम होता था। हिंदू ठेकेदार संघ के लोग भी अलग से पहचाने जा सकते थे। इनके निशाने पर अग्नि मिसाईल हवाई जहाज आदि थे। इनकी राय थी जब ये हथियार पाकिस्तान पर नही चलाये जा रहे तो इनका प्रदर्शन खाली पीली नपुंसकता दिखाने के अलावे और कुछ नही। इनकी राय में इस तथाकथित सेकुलर मुल्लापरस्त संविधान से कोई आशा करना बेकार ही था। हांलांकि मेरे पूछे जाने पर ये अपने आईडियल संविधान पर कोई जानकारी विशेष नही दे पाये। मुस्लिम ठेकेदार भी अपनी राय जाहिर करने मे पीछे नही थे। एक सज्जन उर्दू मे शरिया कानून लागू किये बिना भारत मे सुख शांती स्थापित न हो पाने पर अडिग थे। हमारे द्वारा चंद सवालात पूछने पर वे थोड़ा हड़बड़ा गये। हिंदु द्वारा उर्दू पढ़ लेने पर उन्हे बेहद हैरानी थी। खैर उन्होने वक्त की क्मी का हवाला देते हुये माजरत के साथ विदा ले ली।

वैसे सबसे नरम दिल नजरिया दलित विचारको का ही था। आखिर बाबा साहेब के बनाये संविधान से लेकर बहन जी तक सारी चीजें उनके लिये श्रद्धेय कि श्रेणी मे आती हैं। हालांकि संस्कृत शब्द श्रद्धेय उन्हे स्वीकार तो न होगा लेकिन अभी दलित शब्दावली का निर्माण हुआ नही है शायद। आरक्षण विरोधी तो जाहिराना तौर पर इस संविधान के मूल प्रारूप से ही खफ़ा थे। उनकी नजर में आरक्षण के आधार पर अयोग्य को नौकरी देकर ही भारत के हालात इस स्तर तक गिर गये हैं। हालांकि हमने उन्हे याद दिलाने की कोशिश की भाई यह भ्रष्टाचार तो तब से आसमान पर है जब वी पी सिंग ने आरक्षण लागू भी न किया था। लेकिन साहब सोशल मीडिया मे सुनने की कहां होती है आसमानो से उतरो अपनी राय पेलो। सामने वाला सहमत न हो तो उसको तमाम उपाधियों नवाजो और कट लो।
सबसे संतुलित किसम का विरोध अपने एक बिलागर भाई का रहा| उनके हिसाब से मेरा भारत महान कहना ही मूर्खता है। तमाम खामिया उनकी उंगलियो की नोक पर गिनी गयीं। वैसे खामिया तो हर देश मे ही है, अमेरिका तक हजार किसम की समस्यांओ से दो चार है। साल में दो दिन अपने न सही  बच्चो की खातिर तो "मेरा भारत महान" बोलना तो बनता ही है भाई। बचपन से ही मेरा भारत बेईमान सीख लेंगे तो जाने इस देश का और क्या हश्र होगा।  सोचते सोचते सोचा जाये तो हमारा संविधान कैसा भी है लेकिन हर किसी को अपनी राय रखने, अपने मतभेद प्रदर्शन करने का हक तो मिला ही हुआ है। केजरीवाल संसद और व्यवस्था को कितना भी गरियाय���ं लेकिन यही व्यवस्था उन्हें प्रधान मंत्री के घर के बाहर धरना देने की छूट तो देती है कि नही। दसियों धर्म, भाषा, जति राज्यों में बटे इस देश के हर नागरिक को एक माला मे गूंथा हुआ भी इसी संविधान ने है। हिंदी हिंदू हिदुस्तान करने वालो लोगो की तरह जिन्ना ने भी उर्दू इस्लाम पाकिस्तान किया था। नतीजा क्या हुआ सिर्फ़ भाषा के आधार पर ही उसके दो टुकड़े हो गये। इस्लाम के नाम पर बनाये देश मे मस्जिदो दरगाहों इमामबाड़ो मे रोज बम धमाके हो रहे हैं। और बलोचिस्तान अलग देश बनने की कगार पर है।

मुझे भी अपने संविधान मे एक कमी खलती है। यह आदिवासियो के हकों की रक्षा करने मे नाकाम रहा है। चौसठ सालो मे आज तक उनके हितो के लिये कोई राजनैतिक आंदोलन खड़ा नही हो पाया। दिल्ली के बुद्धीजीवी, पत्रकारिता के गलियारे मे एक भी आदिवासी विचारक नही। सांसद और विधायक भी जो बने हैं सारे आदिवासी जमींदार परिवारो के है।
आरक्षित नौकरियों का अधिकांशतम हिस्सा इसाई धर्म अपना चुके उच्च शिक्षित परिवारो को चला गया। उसके जंगल वन विभाग ने साल सागौन के बागान बना दिये। और उसके सशस्त्र विरोध आंदोलन तक का नेतृत्व बंगाल, आंध्रा के वामपंथियो के हाथ मे है। मूल आदिवासी आज भी अपनी जगह ठगा हुआ खड़ा है।
लेकिन इन तमाम खामियों को दूर कर हमे अपने सपनो का प्यारा भारत बनाना है। बनने तक क्या किया जाये पर गालिब का एक शेर याद आ रहा है-

आशिकी सब्र तलब, तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूं, खून ए जिगर होने तक

Sunday, January 13, 2013

रामदेव बाबा ’पाकिस्तानी’


साहिबान मेहरबान कदरदान एक बात मैं दावे से कहना चाहता हूं कि भारत और पाकिस्तान जुड़वा भाई हैं। अब यह बात सरसरी तौर पर कुछ राष्ट्रभक्तो को बुरी लग सकती हैं। परंतु   ऐसा मान लेने से बड़े वाले हिंदु राष्ट्र का नक्शा बाबा रामदेव की तरह प्रमाणिकता प्राप्त कर सकता है। खैर कोई अगर इस बात को न मानता हो तो उसके बताने के लिये हमारे पास दोनो देशों की अनेको चारित्रिक समानताएं हैं।

सबसे पहले जिस तरह अपने परिवार के लोगो की शहादत दे चुका गांधी परिवार हर चुनाव में उनके फ़ोटू लहरा जनता से अनुकंपा नियुक्ती प्राप्त कर लेता है। उसी तरह पाकिस्तान का भुट्टॊ परिवार भी पाकिस्तान की छाती पर मूंग दल रहा है। दोनो देशो की जुड़वा जनता बड़ी भावुक है, फ़िल्मो के दुखी सीन के बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ जनाजे का वीडियो या माला पहनी तस्वीरो को देखते ही भ्रष्टाचार, महंगाई, बेबसी का अपना गम भूल इनके गम के साथ गमगीन होकर वोट डाल देती है। चुनांचे कि दोनो देशो के प्रमुख विपक्षी दलों भाजपा और मुस्लिम लीग को हालिया दशकों में ऐसी कोई शहादत देने का सौभाग्य प्राप्त नही हुआ है। सो उनके समर्थक दोनो खानदानो की इज्जत की मिट्टी पलीद करने, उनके बारे मे झूठी कहानिया गढ़ने और उनको विदेशी ताकतो का जासूस करार देने को ही चुनावी जीत पाने का जरिया समझते हैं।

इधर के धर्म रक्षक हिंदु हिंदी हिंदुस्तान का नारा लगाते है उधर के उर्दू मुसलमान पाकिस्तान के। उधर के देश भक्तो ने हिंदुस्तानी भाषा को शुद्ध उर्दू बनाने के लिये दुनिया तमाम के शब्द गढ़े, हिंदु समझे जा सकने वाले तमाम शब्दो का उपयोग बंद कर दिया। इधर भी हिंदुस्तानी को शुद्ध हिंदी बनाने के लिये एक से एक शब्दो की खोज की गयी और उर्दू लग सकने वाले शब्दो को दरकिनार कर दिया गया। लेकिन दोनो तरफ़ के धर्म रक्षक नकारा निकले और आज भी दोनो देशो के आम नागरिक बिना किसी डिक्शनरी की सहायता के प्रेम से बात कर सकते हैं।  मै तो कहता हूं कि दोनो देशो के अखबार और साहित्य लिपी बदल के एक दूसरे के यहां छपने लगें तो इन राष्ट्रवादियों की चौसठ साला मेहनत पर महज एक साल में पानी फ़िर सकता है।
एक जगह  पाकिस्तान अपुन लोगो से भारी है वह यह कि उनका बाबा ए कौम जिन्ना पाकिस्तान बनाने के तुरंत बाद अल्लाह को प्यारा हो गया  सो आज भी जिन्ना की  हरकतों का अंजाम भुगतते हर पाकिस्तानी के लिये श्रद्धेय है।  अपने नेहरू जी चीन युद्ध में देश को हरवाने के बाद निपटे कि उनका किया धरा कोई नही पूछता। मै सोचता हूं कि अगर वो भी गांधी जी की तरह बटवारे के तुरंत बाद "हे राम" कहते हुये सौभाग्यवता हो जाते तो उनकी भी भौत इज्जत रहती अपने देश में।
खैर समानताओं की आखिरी कड़ी में जिस तरह अपने बाबा रामदेव कालाधन, भ्रष्टाचार,, नाकाम सरकार चुनाव सुधार आदि आदि इत्यादी एक सौ एक मांगो को ले अपने चेले चपाटियों के साथ दिल्ली मे अनशनिया गये थे। ठीक उसी तरह पाकिस्तान के शुद्ध स्वदेशी बाबा मिन्हाजुल कुरान के सर्बरा जनाब मौलाना तहारूल कादरी साहब लगभग ऐसी ही मांगो के साथ इस्लामाबाद में आज लांग मार्च कर धरना देने वाले हैं। बाबा की तरह कादरी साहब भी सेकुलर बाबा होने का दावा कर रहे है। बाबा की तरह कादरी साहब का भी कोई ऐसा सालिड राजनैतिक बैकग्राउंड नही है। जिस तरह बाबा के पीछे हिंदु ठेकेदार संघ का समर्थन था उसी तरह कादरी साहब को मुस्लिम ठेकेदार संगठनो का पूरा समर्थन मिल रहा है। हालांकि जिस तरह बाबा को कुछ और बाबा ठग और फ़र्जी करार दे रहे थे ठीक उसी तरह कादरी साहब को भी कुछ मौलवी फ़र्जी बता रहे हैं। जिस तरह भारतीय मीडिया, बुद्धिजीवि वर्ग बाबा को घेर रहा था उसी तरह पाक मीडिया भी कादरी साहब की पोल पट्टी खोलने में भिड़ा हुआ है।
चूंकि दोनो के पीछे कार्य कर रही ताकतें चुनावी मैदान में सत्तारूढ़ गठबंधन को धाराशाही करने में नाकाम है तो वे चाहते है कि शांती पूर्ण लोकतांत्रिक प्रदर्शन का सहारा ले महंगाई घोटालो कुशासन से भड़की हुई जनता को घरो से बाहर निकाल ऐसा अराजकता भरा माहौल पैदा कर दिया जाये कि सरकार चारो खाने चित्त हो जाये। आखिर लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गयी सरकार को बिना चुनाव के निहायत लोकतांत्रिक तरीके से निपटाने का प्रयास हम दो बिरादर मुल्को के सिवा कहां किया जा सकता है भला। खैर अपने श्रद्धेय बाबा को तो जान बचाने के लिये सलवार पहन कर आधी रात भागना पड़ गया था उनके चेले चपाटियो को पुलिस ने पीट कर भगा दिया था। कादरी साहब का भी अगर मिलता जुलता अंजाम हुआ तो मै अपने इस लेख मे जबरदस्ती दो चार सौ लाईने जोड़ "भारत पाकिस्तान भाई भाई" नामक शोध ग्रंथ बना "इति सिद्धं" लिख, पीएच डी के लिये जमा कराने की सोच रहा हूं ।

Thursday, December 27, 2012

बलात्कारियों को सरकारी प्रस्ताव


आदरणीय बलात्कारियों


पहले तो आप हैरान मत होना कि हम कैसे आपको  आदरणीय कह रहे हैं। बलात्कार की घटना पर चहुंओर कड़े कदम की मांग पर घिरी उपीए सरकार के मुखिया मन्नू जी नें हमको आप लोगों से बातचीत के लिये इंटरलोक्यूटर नियुक्त किया है।  आप लोगो को समाज की मुख्यधारा में लाने के खातिर हमें  आपके  आदरणीय होने के अहसास और आत्मसम्मान  को जगाना होगा, ताकि आप हिंसा और बलात्कार छोड़ दें। देखिये महिलाओं के साथ संबध बनाने का जो तरीका आपने चुना है वह निहायत ही अलोकतांत्रिक, अमानवीय और निंदनीय है।  जिस तरह हिंसा छोड़े बिना नक्सलवादियो से बातचीत नही की जा सकती है वैसे ही आपसे भी  बलात्कार बंद किये बातचीत नही की जा सकती। हम यह मानते हैं कि फ़िल्मो और विज्ञापनो में आपको कामुक और अश्लील दूष्य दिखा आपको उत्तेजित किया गया है। हम यह भी जानते है कि माश्चराईजर के विज्ञापन मे  हीरो का हाथ जिस तरह की सुंदरी की त्वचा पर फ़िसलता है वैसी सुंदरिया आपको उपलब्ध नहीं है। भारत में लोकतंत्र है और सभी को बराबरी का अधिकार है। हम चाहते हैं कि आप सही राह अपना कर अपना हक हासिल करें। देखिये हम आपको याद दिलाते है वो पुराना फ़िल्मी गीत

बड़े मियां दीवाने ऐसे न बनों।

हसीना क्या चाहे हमसे सुनों॥

सुंदरिया ऐसे ही नही मानती है उसके लिये बाजार से विशेष उत्पाद लेने पड़ते हैं। इसलिये जिस एक्स इफ़ेक्ट डिओ को लगाने से राह चलती कोई भी सुंदरी हीरो के साथ चिपक जाती है वह डिओ हमारी सरकार ने आपको दस रूपये बोटल उपलब्ध कराने का निर्णय लिया है। साथ ही जाकी की वह अंडरवियर जिसे दिखाते ही महिलाओ के मन में कामना भड़क उठती है वह दस रूपये प्रति नग के रियायती भाव से आपको उपलब्ध कराये जायेंगे। हमने एक कमेटी बनाने का भी फ़ैसला किया है जो ऐसे समस्त उत्पादो को चिन्हांकित करेगी जिन्हे दे कर आपको जबरदस्ती के बजाये सहमती से संबंध बनाने का अवसर मिल सके। हमारी महात्वाकाक्षी डाईरेक्ट कैश ट्रांसफ़र योजना  के तहत आपको हर महिने हजार रूपये ट्रांसफ़र किये जाने पर भी विचार चल रहा है जिससे आप पोस्ट कतरी सराय गया से चमत्कारी सिद्ध अंगूठी,  मंगा अपनी मनोकामना पूरी कर सके।

हम जानते हैं कि जब हमारे देश कि जनता का ही हम पर पर विश्वास नही करती तो आप कहां से करेंगे। सो हम विश्वास जमाने के कदम के रूप में  उन ज्योतिषियों पंडितो की मुफ़्त सुविधा तत्काल आपको प्रदान कर रहे हैं जो चौबीस घंटे के अंदर करी कराई, वशीकरण, रूठा प्यार वापस आना, मनचाही महिला को वश में करने का ग्यारनटीड उपाय प्रदान करते है। इस हेतु आप
 पंडित संजय शर्मा
 इंदिरा मार्केट दुर्ग
 97540-55554

सूफ़ी रहमत अली
मौदहापारा रायपुर
9716640425

से संपर्क कर सकते है।
( इन की प्रमाणिकता स्थापित करने के लिये पत्र के साथ उस लीडिंग अखबार की प्रति संलग्न है जिसमे इनके विज्ञापन प्रतिदिन आते है।)

आपस की बात है भईया हम लोगो केर उपर शनी की साढ़े साती चल रही है। भगवान के अल्लाह की खातिर दो चार महिने के लिये ये सब बंद कर दो। कम से कम दिल्ली छोड़ किसी  भी राज्य में बलात्कार करो वहां न मीडिया जायेगा न बवाल मचेगा। दिल्ली मे बवाल मचा हुआ है,  प्रदर्शनकारी शरिया कानून लागू कर बलात्कारियो को सरेआम फ़ांसी देने की मांग कर रहे हैं।  लागू कर देंगे तो फ़िर बवाल मच जायेगा कि महिलाओं को बुरका पहनने कहते हो। एक तरफ़ कुंआ है दूसरे तरफ़ खाई। हमारा नही तो देश का सोचो ऐसे एक एक बलात्कार पीड़िता को सिंगापुर भेजना पड़ जाये तो देश कंगाल हो जायेगा । इस बेचारी का आंत निकाल दिये हो कितनो को तो रोज बलात्कार के बाद आग लगा दी जाती है। अरे जब देश नही बचेगा तो बलात्कार कहा करोगे भाई यह भी तो सोचो।

आशा है आप सरकार के प्रस्तावो को गंभीरता से लेकर सरकार की अच्छी नीयत का जवाब सकारात्मक कदम से देंगे। हम विश्वास दिलाते है कि नार्को एनालिसिस, पुलिस सुधार, फ़ोरेंसिक लैब को आधुनिक बनाने का हमारा कोई इरादा नही है, ना ही हमे सत्ता से हटा सता पाने की ख्वाहिश रखने वाले दलो का ऐसा कोई विचार है। बस  मीडिया और फ़िल्मो के द्वारा अमेरिका की तरह फ़्री सेक्स वाली ओपन सोसाईटी बनने  की देर है। उसके बाद आप लोगो की सारी परेशानियां दूर हो जायेंगी।

आपका शुभचिंतक

अरूणेश सी दवे


सूचना - "महिला संगठन, बुद्धीजीवी उपीए सरकार के इस इस कदम और मेरे इस पत्र पर कोई भी प्रदर्शन करने के पहले गुगल में जा इंटरलोकूटर का अर्थ और उसके काम करने के तरीको को उगलवा ले"

Sunday, December 23, 2012

दिल्ली गैंगरेप- आंदोलन नहीं पागलपन


दिल्ली गैंग रेप की जघन्य घटना ने देश को उद्वेलित कर दिया है। वास्तव मे यह जघन्यतम अपराध भी है, लेकिन इसके बाद जो कुछ देश में हुआ वह अभूतपूर्व है। यह कोई अकेली घटना भी नही थी। ऐसी घटनाएं रोज इस देश के हर शहर में घटती है। और इस घटना में तो पुलिस ने सारे अपराधियों को गिरफ़्तार कर लिया लड़की को सर्वश्रेष्ठ उपचार मिल रहा है। एक सरकार इससे ज्यादा क्या कर सकती है?  "महिलायें सुरक्षित नहीं है" का नारा जरूर कई सवाल खड़े करता है। पर इस सवाल का जवाब सरकार और पुलिस के पास नही समाज के पास होना चाहिये। उसी समाज के पास जिसके तोड़ फ़ोड़ हिंसा या तथाकथित शांती पूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोग हिस्सा हैं।


दरअसल यह प्रदर्शन, हिंसा और पागलपन स्वयंस्फ़ूर्त नही है। मीडिया द्वारा चार दिनो से एक ही घटना दिखा दिखा कर, पुलिस को दोषी निकम्मा ठहरा ठहरा कर, उकसाया गया गुस्सा था। शुरू में कैमरा टीमों द्वारा प्रदर्शन की जगह और समय क्षात्रो एवं अन्य संगठनो से तय करके जमा किया जमावड़ा था। टीआरपी का खेल, सनसनी की चाहत में इस बेलगाम मीडिया ने उस ज्वार को पैदा किया जिसमें समस्याओं से त्रस्त और समाधानो से दूर गुस्साया मध्यमवर्ग जुट गया। राष्ट्रपति भवन में घुसने की जिद लगाया अनियंत्रित युवा माब जिसमें महिलाये, बूढ़े, बच्चे भी शामिल थे क्या पुलिस से फ़ुलों के हार की उम्मीद कर रहा था? बधाई की पात्र है दिल्ली पुलिस जिसने दो दिनो की हिंसा और प्रदर्शन को इतने प्रोफ़ेशनल और मानवीय तरीके से अपने जख्मी जवानो अधिकारियों की कीमत पर संभाला। वरना कितने जख्मी होते कितने मरते उसका कोई हिसाब न होता और यही मीडिया गला फ़ाड़ कर "लोकतंत्र की हत्या हो गयी" चीख रहा होता।

"हमारे नेता नपुंसक है", "हमारी पुलिस नपुंसक है" "बलात्कारी को फ़ांसी दो" का नारा लगाने वालो से मै पूछना चाहता हूं कि कहा से आये है ये लोग? इन बलात्कारियों को इसी समाज ने पैदा किया है और नेताओ को भी। और मनोविकार पैदा कौन कर रहा है? जापानी तेल और लिंग वर्धक यंत्र का विज्ञापन कौन छापता है नेता या मीडिया? पुरूष जीन्स के विज्ञापन में अर्धनग्न महिला का फ़ोटो कौन दिखाता है नेता या मीडिया ? महिलाओ के जिस्म की नुमाइश कर अपना माल बेचने वाले बाजार को माध्यम कौन दे रहा है नेता कि मीडिया ??? अपने उकसाये आंदोलन के इस हिंसा के दौर में पहुंचने पर लोगो से शांती और अहिंसा की अपील कर रहे मीडिया ने पत्रकारिता नैतिकता और ढोंग की सारी हदें पार कर दी हैं। खाप पंचायत वाले अपनी बेटियों को जब इस बाजारवाद के दुष्परिणामो से बचाने की कोशिश करते तो यही मीडिया उनको तालीबान करार देता है। फ़ांसी की सजा ही एक समाधान हो सकता है पर इस देश में कानून का कितना दुरूपयोग होता है यह भी किसी से छुपा नही है। जरूरत फ़ोरेंसिक लैब को अत्याधुनिक बनाने और ऐसे जघन्य अपराधों में नार्को एनालिसिस जैसे आधुनिक उपायों को कानूनी जामा पहनाने की है। लेकिन इसकी बात और मांग कर कौन रहा है?
यह आंदोलन तो बिना नेतृत्व, समाधान का बेसरपैर का आंदोलन है। लोकपाल जैसे सशक्त नेतृत्व समाधान और कानूनी प्रस्तावो वाले आंदोलन के साथ इस मीडिया ने क्या किया था? जनता का अंहिसक शांती पूर्ण आंदोलन जब चरम पर पहुंचा तब इसी मीडिया ने उसके पैरो के नीचे से जमीन खसका दी थी। "भीड़ नही आई" की हेडलाईन्स से लेकर तमाम हथकंडे अपनाये गये। मतलब साफ़ है इस मीडिया को आंदोलन के उद्देश्यो से कोई लेना देना नही है। सनसनी फ़ैलाओ, टीआरपी खींचो और जब अपने को पोषित करने वाले वर्ग के हितों में आंच आती नजर आये तो तत्काल कन्नी काट लो। 


दरअसल मध्यमवर्ग में घोटालो महंगाई को लेकर भयानक गुस्सा है, जो आज हिंसा में नजर आ रहा है।। इस गुस्से की लहर फ़ैलाने वाले विपक्ष से भी अनेकों सवाल पूछे जाने चाहिये। कांग्रेस पार्टी की सरकार को महाभ्रष्ट करार देने वाले, चार सौ लाख करोड़ के तथाकथित कालाधन, दो लाख करोड़ से ज्यादा के हर महिने खुलासा होने वाले घोटालों पर चीखते चिल्लाते विपक्षी तब कहां थे जब यह घोटाले हो रहे थे? 2G लाईसेंस की बंदरबाट जब हो रही थी तब क्या भाजपा के महारथी सो रहे थे? जब कोयला खदान फ़ोकट के भाव में बाटी जा रही थी तब ये शरद यादव, वामपंथी  क्या संसद में नही थे? क्या ये इतने नकारा है कि इन्हे पता ही नही चलता? सबके तार जब इस खेल में जुड़े हुये है,  अंबानी के घोटाले के उपर बोलने का साहस जब किसी के पास नही है, तो घोटाला घोटाला क्यों चीखना? सत्ता चाहिये तो जात, धर्म, आरक्षण की पालिटिक्स में माहिर बनो। खेल के नियम जब तय है तो कांग्रेस के लगातार जीतने पर फ़ाउल फ़ाउल क्यों चिल्लाना। यह देश जैसा भी चल रहा है कम से कम चल तो रहा है। इसको मिस्र तो मत बना दो।



और आखिर में दिल्ली पुलिस से मैं अपील करूंगा कि अब मौका लगे तो आम जनता के बजाये इन मीडिया वालो को कूटना। इनको भी तो पता चले पुलिस से टकराव और हिंसा मे जब चोट लगती है तो दर्द कितना होता है।

Thursday, November 29, 2012

भारतीयों का "नुन्नू" सबसे छोटा


सुबह सवेरे हमारे पड़ोसी चिंताराम जी अत्यंत चिंतित अवस्था में हमारे पास पहुंचे। फ़ुसफ़ुसा कर बोले- ’ दवे जी गजब हो गया, अभी अभी सर्वे की खबर आयी है कि भारतीयों का सबसे छोटा होता है।" हमने कहा - ’देखो मियां दिल बड़ा होने का कोई फ़ायदा भी नहीं है। कोई दूसरी समां गयी तो भारतीय बीबीयां मार मार के छप्पर कर देती है।’ चिंताराम जी बोले -’ गुरू दिल नहीं सामान छोटा होता है’’ हमने कहा-  यार कौन सा सामान है आगे से बड़ा बनवा लिया जायेगा।’  चिंताराम जी का मुंह उतर गया- ’ बोले, अब कुछ नही हो सकता गुरू अनुवांशिक साईज है। आप समझ नहीं रहे हम उस सामान विशेष का बात कर रहे है जिससे प्रजनन होता है। यह बात बीबीयों को मालूम पड़ जायेगी तो हम लोग क्या मुंह दिखायेंगे। रोज टांट सुनने मिलेगा "है छोटा सा, बस बातें बड़ी बड़ी करवा लो।’ 



 हमने उन्हे ढांढस बंधाया - ’देखो चिंताराम जी अंग्रेजी में कहावत है, "When it happens to all it happens to none।" जब सभी भारतीयों का छोटा है तो यह कोई टांट का विषय नही। भगवान ने हर देश के आदमी औरत का डिजाईन एक दूसरे के हिसाब से न बनाया है भाई।  आजकल तो महिलायें खुद ही साईज जीरो के पीछे पड़ी हैं।' चिंताराम जी बोले -’ दवे जी लफ़्फ़ाजी से सच झूठ नहीं हो जाता।  इस खबर को सेंसर करवाईये,  वरना कहीं मुह दिखाने लायक नहीं रहा जायेगा’ हमने चिंतित अवस्था में कहा-  ’चिंताराम जी ये बताओ पाकिस्तानियों का साईज क्या है। ’ चिंताराम जी मुस्कुराते हुये बोले - ’ अपने ही बराबर का है गुरू। हमने कहा - ’ फ़िर तो टेंशन की बात नही है।  नही साले सुबह शाम छेड़ते,  इस मुद्दे पर जवाब देना भी मुश्किल हो जाता। अब  ये हिंदुओ को दुनिया में सबसे श्रेष्ठ,  मुसलमानों को दुनिया में सबसे श्रेष्ठ  बताने वालों को तो मुंह छुपाने का जगह भी नहीं मिलेगा। बड़े साईज वाला एक मिनट में कह देगा ’जा बे मेरा सात इंच का है तेरा सिर्फ़ चार का।"

चिंताराम जी भड़क गये - ’ दवे जी,   दुखी होने वाली बात पर दांत निपोर रहे हो। यहां हिंदुस्तानियो की मर्दानगी दांव पर लग गयी है और आप को ठिठोली सूझ रहा है। ’ हमने कहा - ’ काहे चिढ़कते हो भाई, सेक्स में सामान विशेष का साईज मैटर नहीं करता है यह वैज्ञानिक तथ्य है।  अपने बड़े बूढ़े कह भी गये है- ’बड़ा हुआ सो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।’  फ़िर अपन भारतीय तो बच्चा पैदा करने में विश्व गुरू हईये हैं। चिंताराम जी बोले - " कुछ भी कहो दवे जी यह भारतीय मर्दों को बदनाम करने की साजिश है। हमने कहा - "भाई अब इसके लिये तो विश्व हिंदु परिषद और जमाते इस्लामी को  कुछ करना पड़ेगा। दिन रात एक दूसरे के साथ साजिश साजिश खेलते रहते है मिल कर विदेशियो की साजिश का सामना करें। वैसे यह मामला पूरे देश मे एकता ला सकता है। लोग धर्म जात भूल कर सामान विशेष के सम्मान की रक्षा के लिये एक जुट हो जायेंगे। मै तो कहता हूं केजरीवाल की ’आम आदमी पार्टी’ को इस मुद्दे को हाईजैक कर लेना चाहिये।"

चिंता राम जी गुस्से से बोले - " यार हर समय मजाक सूझता है आपको। मुद्दे पर आओ इस दुष्प्रचार के खिलाफ़ कुछ राह बताओ।" हमने कहा - ’ मियां यह सब सर्वे मनगढ़ंत होते है, आधे अधूरे तथ्य लेकर बहुत कम सैंपल साईज लेकर मन चाहा नतीजा निकाल लिया जाता है। देखते नहीं अपने चुनाव विष्लेषण को सब सर्वे वाले बाद में  मुंह छुपाते घूमते है।  आप  जिस देश के सामान विशेष की साईज सबसे बड़ी है उनका परफ़ारमेंस टाईम सबसे कम बना और छोटी साईज वालो का परफ़ार्मेंस टाईम सबसे अधिक कर थोड़ा हेर फ़ेर कर  अपना नतीजा घोषित कर दो। साईज से परफ़ामेंस टाईम ज्यादा मैटर करता है।’ इतना सुनते ही चिंताराम जी प्रसन्न होकर घर को लौट गये। और रही बात हमारी तो हमे कोई चिंता है ही नही। हम तो शादीशुदा हो बुढ़ापे की ओर अग्रसर हैं। चिंता कुंवारे करे कि सुंदरियां विदेशियो के प्रलोभन में न आ जायें। वैसे इस मामले में युवाओ को बाबा रामू का स्वदेशी आंदोलन ज्वाईन कर लेना चाहिये। बाबा रामू कोई जड़ी बूटी खोज भी लायेंगे। इस मामले में वे पतंजली रिषी के ताउ हैं। लौकी से गाजर तक नित नया डिस्कवरी करते रहते हैं। इससे पहले कि जापानी तेल वाले इस सर्वे का नतीजा उड़ा ले स्वदेशी बाबा क्या बुरा रहेगा। देश का पैसा और इज्जत दोनो देश में रही आयेगी। 

Sunday, November 25, 2012

कसाब की फ़ांसी गलत




देखिये साहब कसाब  दीन की राह में शहीद हो खुदा से हूरों को पाने के बिजनेस के सिलसिले में अवैध तरीके से भारत आया था। कितने लोग मरें इसका कोई एग्रीमेंट नहीं था, जितने मार सको उतने मारो।  किनारे उतरते ही मरता, कश्ती पलटने से मरता तो भी डील कायम रहती। सो पकड़ा जाने से भी उसके इस एग्रीमेंट में कोई फ़र्क पड़ने वाला नही था। सौदा तभी टूटता जब वो बुढ़ापे में अपनी मौत मरता।  प्रधानमम्मी सोनिया ने सब गुड़ गोबर कर दिया,  अपनी इमेज के लिये  उसको  शहीद बना दिया। अपना दुख  भाजपाई मित्र पर जाहिर किया तो वे भड़क गये- "पहले तो जान लो दवे जी, कसाब फ़ांसी से नही डेंगू से मरा है।   मच्छर भी कांग्रेसियों से देशभक्त  निकले ये तो बिरयानी खिला  रहे थे।" उनको बताया कि भाई फ़ांसी का वीडियो शूटिंग हुआ है, अब तक जन्नत में हूरों की डिलेवरी भी ले चुका होगा।" तो कहते है- "पहले दिन ही लटका देना था चौराहे में।  कोई हूर-वूर,  सब बकवास बात है।" हमने उनसे स्वर्ग और अप्सरा वाला मामला नही पूछा। फ़ोकट देशद्रोही सेकुलर का लेबल मिल जाता।

खैर मुस्लिम मित्र से पूछा तो बोले -" इस्लाम में  निर्दोष की, महिलाओं, बच्चो की जान लेने पर दोजख जाना पड़ता है।" हम कहें कि - "देखो मियां,  बेचारे कसाब को तो पता नही था ना ये।  बाद में कितना पछताया। वह तो बेचारा सच्चे दिल से खुदा की राह पर चलना चाहता था। दोजख तो उस मौलवी और हाफ़िज सईद को मिलेगी जिन्होने इसे बरगलाया था।" तो जवाब मिलता है कि मूर्खो को जन्नत नसीब नही होती। बुरे काम का बुरा नतीजा ही निकलता है।"

 वैसे देश में कसाब की फ़ांसी पर और तरह तरह की प्रतिक्रियाएं भी आ रहीं है। एक सुशील झा लिखते है- "किसी ने ट्विटर पर लिखा कि सोचिए बीस साल के बाद कसाब यरवदा जेल में सूत कात रहा होता और उस सूत से बना कुर्ता पाकिस्तान के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री को भेंट किया गया होता। सोचिए कि कसाब टीवी चैनलों पर सूत कातते हुए कहता कि मैं आज भी पश्चाताप कर रहा हूं अल्लाह मुझे माफ करें।....... सोचिए वो कितनी बड़ी नैतिक जीत होती भारतीय मूल्यों की पूरी दुनिया में."

 यह पढ़ते ही कानो में "रघुपति राघव" भजन बजने लगा। अहिंसा, शांती, प्रेम, दया...... आहाहाहा नारायण नारायण।  ऐसे उत्तम लोग आजकल मिलते ही कहा है। और अपना पड़ोसी पाकिस्तान तो अति उत्तम है। वो कितनो को  सूत कातने भेजेगा पता नहीं।  कसाब की बुनी खादी का कुर्ता पहने जनता के हितैषी नेता बड़े सेक्सी भी नजर आयेंगे।  आखिर जो देश कसाब पर दया कर सकता है वो अपनी जनता पर भी एक न एक दिन दया करेगा न भाई।  खैर बात वैसे बुरी नही आंख के बदले आंख वाली कबीलाई संस्कृती से उपर उठना भी चाहिये ही।  लेकिन इस उत्तम विचार को ट्वीटर पर चपकाने वाले महात्मा ने शायद इस बारे मे विचार नही किया होगा  कि भारत की गरीब जनता के पास खुद खाने को कुछ नही। दिल्ली के प्रेस क्लब मे हाफ़ रेट की महंगी व्हिस्  ी पीने और मुर्गा चबाने के बाद दयालु  हुआ जा सकता है।  पर सूखी रोटी चबाने वाले के मोबाईल मे "यह सुविधा आपको उपलब्ध नही है" का रिंग टोन बजने लगता है।

कई भाई जनता के सामने उन्माद परोसने की रोमन ग्लैडियेटरी संस्कृती का भी हवाला दे रहे है। तो एक सज्जन भारत फ़ांसी पाये लोगो मे नब्बे प्रतिश्त आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक होने का दावा कर रहे थे। एक दूसरे सज्जन जार्ज ओरवेल के हाथी के शिकार और कसाब की फ़ांसी में उचित संबंध जोड़ रहे थे।  हाथी ने "मस्त" की अवस्था में तोड़ फ़ोड़ की, आदमी को मारा था। कसाब ने "गुमराह" की अवस्था में यह किया था।  दोनो बुरी हरकतो के बाद शांत हो गये थे। सज्जन के हिसाब से उन दोनो को मारे जाने का कोई औचित्य नही था।"  दोनो को तमाशबीन जनता के दबाव में मार दिया गया था। हमने सोचा- ’अपना कसाब तो माफ़ी भी मांग रहा था,  हाथी ने तो माफ़ी भी नही मांगी थी। उसको तो और नही मारना था।"  खैर वो सज्जन मिलें तो हम पूछे- " भाई हाथी तो "मस्त" की अवस्था खत्म होने के बाद काम का, लाखों रूपये का था। कसाब तो "गुमराह" की अवस्था खत्म होने के बाद लाखो रूपया रोज  खर्च करवा रहा था,  दोनो में तुलना कैसी? लेकिन इसके बाद भी हम सहमत हैं कि कसाब और हाथी दोनो को मारना नही था। आखिर साले की डील पूरी हो गयी हूरे जो पा गया।


खैर घूम फ़िर के हम अपने एक अजीज मित्र के पास पहुंचे, अपना दुख बताया। वे ठठाकर हंसते हुये बोले -"यार दवे जी नाहक परेशान मत हो, कसाब जन्नत पहुंच भी जाये, हूरें मिल जाये तो भी टेंशन नही। देखो अगर नाक न हो तो सेंट किस काम का। वैसे ही सामान विशेष न हो तो हूंर किस काम की।" यह बात सुनते ही हमारी बांछे खिल गयी। वाह ये त हमारे भेजे में आया ही नही था अगर पा भी गया होगा तो भी पछताता रहेगा - हाय मै फ़ोकट आतंकवादी बन गया।"

Tuesday, November 20, 2012

मी बाल ठाकरे बोलतो


बाला साहेब ठाकरे को उनके जाने के बाद भी लोग अलग अलग कारणो से याद कर रहे हैं। विरोधी उनकी शव यात्रा में उमड़ी भीड़ का उचित संबंध नफ़रत की राजनीती से जोड़ रहे हैं। आम भारतीय एक ऐसे आदमी की शव यात्रा में उमड़े लाखों लोगो को देखकर अचंभित था। समर्थक तो उनसे अथाह स्नेह करते ही थे। हालांकि इन सभी में बाल ठाकरे को पहचानने वाला कोई नही था। बाल ठाकरे कार्टूनिस्ट थे, एक कार्टूनिस्ट या व्यंग्यकार वही हो सकता है जिसका राजनैतिक आकलन बहुत तगड़ा हो, जो निर्भीक हो और जो अंदर से कम्यूनिस्ट हो। जिसमे विरोधाभास को पहचानने और व्यक्त करने की जबरदस्त क्षमता हो। बाला साहेब  माओ, लेनिन की किताब पकड़े घूमते कम्यूनिस्टो से भी ज्यादा कम्यूनिस्ट थे। यह विरासत उन्हे अपने पिता से मिली थी। वे कामरेड डांगे को शिवसैनिको को भाषण देने और समाजशास्त्र का पाठ पढ़ाने बुलाते थे। बाला साहेब ने कम्युनिस्ट विचारधारा को मुंबई की परिस्थितियो के हिसाब से अपनाया। और मजे की बात सारे कम्युनिस्ट मजदूर संगठनो को मुंबई से बाहर कर दिया। जब कलकत्ता में एक के बाद एक फ़ैक्ट्री बंद कराने में कम्युनिस्ट लगे थे। तब बाला साहेब के संरक्षण मे मुंबई तेजी से औद्योगिक विकास कर रही थी। वह भी लेबर डिस्प्यूट के बिना, मजदूरों के हितो का ध्यान रखते हुये।

 मराठीवाद,गैरमराठियो का विरोध बाला साहेब का प्रमुख मुद्दा था।   दरअसल किसी भी महानगर में प्रवासियो के बड़ी संख्या में आने से स्थानीय लोगो के हितों का नुकसान होता है। प्रवासी चूंकि पिछड़े इलाको से आते हैं,  वे कम दर पर मजदूरी जैसे काम करने को तैयार हो जाते है। साथ ही परिवार के साथ रहते लोगो की अपेक्षा, अकेले रहते प्रवासी आसानी से अपराध में शामिल हो जाते है। ऐसे में प्रवासियो से किसी भी महानगर का राजनैतिक आर्थिक और सामाजिक संतुलन बिगड़ जाता है। राष्ट्रीय दल इस मुद्दे को उठा नही सकती सो स्थानीय दलो को इससे जनाधार बढ़ाने का मौका मिल जाता है। करांची में तो भाषाई आधार पर बने राजनैतिक दलो नें हथियार बंद दस्ते बनाये हुये हैं। जहां दर रोज आपसी झगड़ो में दस से ज्यादा आदमी मारे जाते हैं। इसके मुकाबले मुंबई मे स्थायी तौर पर रहने वाले प्रवासियों को किसी बड़े भेदभाव का अमूमन सामना करना नहीं पड़ता। और बाला साहेब ने विरोध का अत्यधिक मुखर तरीका प्रयोग जरूर अपनाया। लेकिन पिछले चार दशको मे कभी आपसी तनाव भी नही पनपने दिया, करांची के सामने तो मुंबई प्रवासियों का स्वर्ग है।

बाला साहेब पर मुसलमान विरोधी होने और उग्र बयान देने का भी आरोप लगता रहा है और वे देते भी रहे हैं। लेकिन 1992 के दंगो के अलावा उन्होने बंबई में कभी दंगा होने भी नही दिया। मुंबई दंगो के वक्त बाबरी मस्जिद कांड के बाद मुंबई के कतिपय मुल्लाओं ने कट्टरपंथी भावनाओ को बहुत भड़का दिया था। इस्लाम खतरे में है के नारे के साथ उग्र युवाओ के बड़े दल हिंसक वारदाते कर रहे थे। पंदरह दिनो तक वहा हिंदुओ पर लगातार हमले होते रहे और उसके बाद बाला साहेब ने शिवसैनिको को जवाबी कार्यवाही के लिये कहा। उसके बाद जो हुआ वो इतिहास है। मुस्लिम युवाओं को भड़काने वालो का कुछ नही बिगड़ा। मासूम बेगुनाह हिंदु और मुसलमान मारे गये।  यह बात भी कम लोगो को ही पता होगी कि उस दंगे को रोका भी बाला साहेब ने था। शिवसैनिको की कार्यवाही शुरू होने के तीसरे दिन ही बाला साहेब को यह अहसास हो गया था कि बेगुनाह मुसलमान मारे जा रहे है। फ़िर भी दंगा रोकते रोकते हफ़्ता गुजर गया अपराधिक तत्वो ने बेतरह लूट मार मचाई। विडंबना यह थी कि दंगा शुरू करने में प्रवासी मुसलमानो का उपयोग किया गया और लूट मार में शामिल ज्यादातर प्रवासी हिंदु ही थे। उस दंगे के बाद दो दशक से उपर बीत गये बाला साहेब ने मुंबई में दूसरा दंगा होने नही दिया। कितने बम धमाके हुये, आतंकवादी हमला भी हुआ।  भारत में दंगे करवा कर सत्ता चाहने वाले भगवा दल और मुस्लिम परस्त राष्ट्रीय क्षेत्रीय दलो की लिस्ट सभी को पता है।  लेकिन बाला साहेब एक ऐसे शख्स थे जिसके इशारे भर से दंगा हो सकता था। रतन टाटा ने शोक संदेश में कहा "भले वो विवादास्पद बयान देते थे लेकिन उन्होने अपने सिद्धांतो से कभी समझौता नही किया। "

वे बयान तो खतरनाक देते थे उसमें कोई शक नही। बाबरी मस्जिद को ढहाने के लिये कई लोग सुबह शाम स्कीम बनाते रहे। भारत भर में रथ घुमाया, ईंट और चंदा लिया आखिर जब कामयाब हो गये तो इतिहास का काला दिन बता दिता। बाला साहेब ने कुछ नही किया, सिर्फ़ कहा "मेरे आदमी थे।" और करोड़ो ऐसे आदमियो का समर्थन प्राप्त कर लिया जिन्हे "सौगंध राम की खाते है" का नारा लगा लगा कर भाई लोगो ने उकसा दिया था। वे बेचारे क्या जानते थे कि अगली लाईन "चंदा हम खायेंगे" होगी। खैर हजारो बातें ऐसी है कि बाला साहेब पर मोहित हुआ जा सकता है या क्रोधित। लेकिन वे ऐसे आदमी तो थे ही जो अपने बयानों और विचारधारा पर अंत तक कायम रहे। यहां तो सुबह गड़करी को क्लीन चिट देकर शाम को "हमारा लेना देना नही है" का बोर्ड लगाने वाले लोग भी है। और जब जाकिर नाईक इस देश में अपने महाविचार बांटते इस्लाम की तथाकथित सेवा करते घूम सकते है। तो बाला साहेब को भी थोड़ा डिस्काउंट दिया ही जा सकता है। आखिर वोट बैंक की राजनीति ही तो इस देश का मूलमंत्र है। और बाला साहेब ही एक ऐसे नेता थे जो राजनितिक चालो और बयानो मे असमानता नही रखते थे

Friday, November 9, 2012

राम नाम सत्य है- जेठमलानी


सुबह सुबह हमारे पड़ोसी चिंताराम जी चिंतित अवस्था में हमारे पास आए- 'दवे जी देखिए, क्या गड़बड़ सड़बड़ हो रहा है। जेठमलानी कहता है कि राम बुरे पति थे। नराधम, खुद का नाम है राम और भगवान को बुरा कहते हैं।' हमने कहा- 'छोड़ो चिंताराम जी जब से दुनिया बनी है, पतियों को बुरा ही बताया जाता है।  जिसकी बीवी से पूछो वही कहेगी, पता नहीं कहां फंस गई। अब इससे बेचारे भगवान भी कहां अछूते रहते।' चिंताराम जी बोले- 'वाह, क्या दुनिया का हर मर्द खराब होता है।' हमने कहा- 'नहीं भाई, दुनिया का केवल हर पति खराब होता है। बाकि तो किसी भी महिला से पूछो उसका भाई कैसा है? तो फट से कहेगी, लाखों में एक। पूछो आपके पिताजी कैसे हैं, तो आंख मे आंसू आ जाएंगे टप-टप करती बोलेगी, उनकी बहुत याद आ रही है मायके जाना है।'

चिंताराम जी मुस्कुराए लेकिन उनकी चिंता कम नही हुई बोले- 'दवे जी लेकिन यह तो हमारे भगवान का अपमान हुआ। संघ, बीजेपी भी चुप है। भगाते काहे नहीं इसको।' हमने कहा -'भगवान का अपमान अगर उसके धर्म को मानने वाला ही करे तो केस नहीं बनता है। हां, कोई मुस्लमान ऐसा कहता तो भिड़ जाते अपने संघी लोग। अब देखो पाकिस्तान में कोई गैर मुस्लिम कुरान का अपमान करदे तो उसकी सजा मौत है, पर कोई मुसलमान करे तो उस पर ईश निंदा का कानून लागू नहीं होता।'

चिंताराम अभी भी चिंतित थे- 'दवे जी बात को मत घुमाओ। ऐसा होता तो काहे प्रवीन तोगड़िया और संघ के बाकि नेता राम जेठमलानी के खिलाफ बयान दे रहे हैं।' हमने कहा, 'अरे भाई ये लोग रामानन्द हैं। राम मंदिर के नाम से खूब माल कमाए हैं। अब राम पर कुछ भी कोई कहे तो कलपेंगे नेई! आदमी जिसका खाता है उसी का गाता है। सीता मंदिर के नाम से चंदा पाए रहते तो समझते कि जेठमलानी पीड़ा व्यक्त कर रहे हैं कि उनकी सीता माता को बिना अपराध इतना कष्ट सहना पड़ा। अब जो सीता जी की पीड़ा समझेगा वह तो राम जी से थोड़ा गुस्सा हो जाएगा कि नहीं। वह तो रामायण में भी लिखा है कि अयोध्या के सारे लोग बहुत रोए थे उस समय।'

चिंताराम जी के भेजे में बात घुसी लेकिन अब उन्हें राजनैतिक चिंता ने घेर लिया बोले- 'दवे जी यह तो सोचो कि बीजेपी की छवि कितनी खराब हो रही है। आखिर मतदाता तो इतना सब नहीं समझता ना।' हमने कहा- 'चिंताराम जी, मामला बहुत टेढ़ा है। जेठमलानी को निकाला तो सारा महिला वोट कट जाएगा। आखिर हर महिला यही सोचती है न कि निर्दोष सीता माता को निकालकर भगवान ने सही नहीं किया था। ऐसे मे जेठमलानी को निकाला तो सब गड़बड़ा जाएगा भाई।' चिंताराम जी को चिंतित होने की पुरानी बीमारी थी। उनकी चिंता कम न हुई- 'जरूर किसी सेकुलर ताकत का हाथ है इस विवाद को पैदा करने में।' हमने कहा- 'गुरु चिंताराम जी अब भाजपाई जेठमलानी राम को बुरे बता रहे हैं और भाजपाई ही कोस रहे हैं। और आप लाते हो बेचारे सेकुलरो को बीच में। आज तो सारे सेकुलर, चाहे वो कांग्रेसी हो या ललुआ यादव, ऐसे रामभक्त बन रहे हैं कि जाने माने सुप्रीम कोर्ट ने रामलला का दावा खारिज कर दिया तो खुद ही मंदिर बनाने पहुंच जाएंगे।'

चिंताराम जी बोले- 'यार दवे जी दाएं-बाएं बात मत घुमाओ। हमको इस जेठमलानी की बलि चाहिए बीजेपी में वो रहेगा या हम।' हमने कहा- 'पगला गए हो क्या? चिंताराम जी, अरे काहे अंदर का बात नहीं समझते। जेठमलानी बड़े रामभक्त आदमी हैं भाई। देखो सुप्रीम कोर्ट में केस चल रहा है राम अयोध्या के मंदिर में पैदा हुए थे कि नहीं। वक्फ़ बोर्ड लगा है कि साहब राम जी तो एक मिथक हैं, वास्तव में हुए ही नहीं थे। चतुर श्रद्धेय जेठमलानी जी ने सारा तर्क खत्म कर दिया। अब देखा कांग्रेस एसपी सारे कह रहे हैं कि राम हमारे भगवान हैं। उनके बारे में बुरा-भला मत कहो जी जेठमलानी। अब सारा बात इस पर आकर टिक गया है कि वे अच्छे पति थे या बुरे पति। बीबीसी सीएनएन तक में आ गया है। पोप ने भी कहा है कि राम ने राजधर्म के खातिर छोड़ा था उन्हें बुरा पति करार नहीं दिया जा सकता। अब देखो बुरे पति थे या अच्छे पति थे। थे यह बात तो पक्की हो गई न। अरे तोगड़ियाओं के चक्कर में मत रहा करो। चिंताराम जी, चंदा लेकर खाली बयान ठोकते रहते हैं। अपने सच्चे रामभक्त तो राम जेठमलानी ही निकले। बिना फीस लिए एक ही बार में सारा मामला निपटा दिए हैं।'

इतना सुनते ही चिंताराम जी की सारी चिंताएं दूर हो गईं। हमसे विदा लेकर निकले तो गली के मोड़ तक राम जेठमलानी जिंदाबाद का नारा लगा रहे थे। हमने भी चैन की सांस ली। बिना उन पर कोई नई चिंता सवार हुए हमारे सिर पर सवार होने तो नहीं आएंगे।

Tuesday, November 6, 2012

मोहन भागवत से अच्छी सोनिया गांधी


एक व्यक्ति के तौर पर मोहन भागवत सोनिया गांधी से कई गुना उंचे पायदान पर है। उन्होने सर्वस्व त्याग जीवन देश की सेवा में लगा दिया।  अपनी काबिलियत के बल पर आज वे आरएसएस के प्रमुख है। वही दूसरी ओर काबिलियत और सर्वस्व त्याग के बिना अपने मुकाम पर पहुंची सोनिया के खाते मे भी कुछ उपलब्धिया जरूर है। पति से विरासत मे मिलें देश के शीर्षस्थ राजनैतिक दल को न केवल उन्होने पुनः अपने पैर पर खड़ा किया बल्कि आठ वर्षो से उस दल को सत्ता की शीर्ष पर बनाये वे अपने बच्चो के लिये उनकी विरासत को बरकरार रखने मे सफ़ल रही हैं।  यह अंतर वास्तव में चकित करने लायक है। एक ओर मोहन भागवत है जिन्होने जीवन के लिये अतिआवश्यक वस्तुओ के अलावा कभी अपने उपर धेला खर्च नही किया। वही सोनिया तमाम सुख सुविधाओ को भोगते हुये राजपाट का आनंद ले रही है। लेकिन दोनो की जो कार्यशैली में फ़र्क है। सोनिया कांग्रेस का चेहरा है तो भागवत भाजपा का दिमाग है। जाहिर है दोनो ही निर्णय अकेले नही लेते। दोनो के पास एक किचन कैबिनेट है जिनके द्वारा हर विषय पर निर्णय लिये जाते है।

और फ़र्क यही आता भी है। सोनिया गांधी के सलाहकार पूर्णतः राजनैतिक लोग है। भागवत के सलाहकार गैरराजनैतिक पृष्ठभूमी के है ।  लेकिन इतने से ही कोई आधारभूत अंतर नही आ जाता है। कोई भी राजनैतिक व्यक्ति या समूह सतत सीखता, अपनी गलतियों से सबक लेता, और अपने निर्णयो के गलत साबित होने पर जनता के क्रोध और तटस्थ आलोचको की आलोचना का शिकार होता रहता है। यही तटस्थ आलोचना आगे होने वाले निर्णयो का आधार भी बनती है।  लेकिन संघ खुद को किसी भी आलोचना से परे रखता है। वह भाजपा से गुप्त दान लेता है, निर्देश देता है और निर्णय गलत होने के बाद  भाजपा का अंदरूनी मामला है का बोर्ड लगा कर कट लेता है।  देश की सामने आती हर राजनैतिक समस्या चुनौती या नीति पर संघ का संघ के तौर पर कभी कोई विचार सामने नही आता। भाजपा के सभी विषयों पर नीतिगत स्टैंड संघ ही तय करता है पर जनता के सामने यह भाजपा के स्टैंड के रूप मे ही सामने आता है।

सोनिया गांधी और भागवत दोनो अपने संगठन (कांग्रेस और भाजपा) के किसी नेता की हैसियत बड़ी होने देना पसंद नही करते।  हालांकि कारण दोनो के अलग है। कांग्रेस को स्वभाविक तौर पर गांधी परिवार के अलावा किसी और का ताकतवर होना मंजूर नही। इसके उलट संघ भाजपा के लोकप्रिय नेता और कार्यकर्ता  और समर्थकों के प्रिय नरेन्द्र मोदी को प्रधान मंत्री पद का उम्मीदवार नहीं बनाना चाहते। कारण बहुत साफ़ है आज मोदी की छवि भाजपा और संघ से बहुत बड़ी हो चुकी है। और प्रधानमंत्री बन जाने के बाद जैसी उनकी कार्यशैली है, वे अकुशल या भ्रष्ट लोगो को बर्दाश्त नहीं करते। इसके अलावा भी गुजरात दंगो के दौरान संघ विहिप और बजरंग दल के लोगो की कारगुजारियो का पूरा दाग उनके ही दामन पर पड़ा था। आज दस सालो बाद भी वे उस कलंक को पूरी तरह धो नही पाये। अब नरेन्द्र मोदी किसी भी प्रकार का कट्टरपंथ अपने राज्य में बर्दाश्त नही करते। प्रधानमंत्री बन जाने के बाद तो वे जिस तरह से राष्ट्र को चलायेंगे वह संघ को किसी कीमत पर मंजूर नही होगा। 

 हालांकि प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बना संघ का अपना निर्णय है लेकिन आश्चर्यजनक रूप से संघ भाजपा राज्यो और दल में छाये भ्रष्टाचार पर कोई स्टैंड नही रखता। भविष्य में चरित्र    िर्माण की दलील आज कोई भी स्वीकार करने को तैयार नही है। निश्चित तौर पर कॊई भी भाजपा समर्थक  इस दिशा में कठोर कदम उठाने की अपेक्षा रखता है। पर भाजपा और उसके नेता तो अपने स्तर पर मुख्यमंत्रियो या मंत्रियो पर किसी प्रकार की नकेल कसने की स्थिती में हैं ही नही। और मोहन भागवत जो उसे नियंत्रित कर रहे है वे किसी भी सूरत मे असफ़लताओ की जिम्मेदारी लेने वाले नही है। वे बंद कमरे मे बैठ कर चीजें तय करते है। परिणाम आने पर पल्ला झाड़ लेते है और भाजपा से वह सारे काम करवा रहे है जो इस भ्रष्टाचार विरूद्ध आंदोलन मे उसकी छवि को कुंद कर रहा है। कल तक कांग्रेस के हर आरोपित मंत्री से पूरी सरकार से आरोप लगने पर नैतिकता के आधार पर इस्तीफ़ा मांगने वाले भाजपाई नेता, अब किस मुंह से जनता और कांग्रेस के सवालो का सामना करेंगे। जब वे खुद अपने अध्यक्ष को आरोप साबित होने के बाद इस्तीफ़ा देने की बात कर रहे हैं। जिस संघ के गुरूमूर्ती द्वारा जांच मे क्लीन चिट का वे दावा कर रहे है क्या वह जांच रिपोर्ट दस्तावेजो के साथ जनता के सामने आना नही चाहिये था ? आज जो दल पहले ही 20 % अल्पसंख्यको का वोट नही पाता किस आधार पर केजरीवाल की आंधी का सामना करेगा।

इस मामले में तो सोनिया गांधी मोहन भागवत से लाख गुना बेहतर हैं। वे और उनका अमूल बेबी अपनी कारकर्तगी के परिणामों और जनता के क्रोध का सामना कर रही हैं। और आलोचनाओ की आंधी के बीच अपनी सरकार और संगठन में फ़ेर बदल कर रही हैं। और चुनाव आते तक वे निश्चित रूप से भाजपा से बेहतर तैयारी कर चुकी होंगी। आखिर वे सत्ता मे है और जनता को लोकलुभावन नीतियो का लालीपाप थमा सकती हैं।

इसके विपरीत मोहन भागवत आठ सालों में भाजपा को  इस स्थिती में लाने के बावजूद श्रद्धेय बने हुये है। अपने द्वारा भाजपा पर थोपे गये अपरिपक्व अध्यक्ष और उनकी व्यवसायिक कारगुजारियो का परिणाम भाजपा पर डाल रहे हैं। और उस पर दबाव भी बनाये हुये है कि उसे अध्यक्ष बने रहने दिया जाये। ऐसे मे मुझे कोई हिचक नही है कि सोनिया गांधी और मोहन भागवत का आई क्यू भले एक समान है। पर सोनिया उसका इस्तेमाल कांग्रेस को मुश्किलो से उभारने में कर रही है, और भागवत भाजपा को बरबाद करने में। आखिर गोलवलकर  गुरूजी का प्रसिद्ध वकतव्य आज भी प्रासंगिक है - "जनसंघ गाजर की पुंगी है जब तक बजेगी ठीक नही तो खा जायेंगे।" लेकिन आज भाजपा देश के सामने वह विकल्प है जिसका व्यापक संगठन है। केजरीवाल के अब तक कोई ठोस ढांचा नजर नही आता। ऐसे में क्या देश भाजपा का "गाजर की पुंगी" बने रहना बर्दाश्त कर सकता है ?

Tuesday, October 30, 2012

थरूर की बीबी - मोदी का दर्द

देखिये साहब ऐसे हम महिलाओ वाले मामले में कुछ कहते नही। पर मोदी जी ने शशी थरूर की भूतपूर्व प्रेमिका वर्तमान पत्नी को पचास करोड़ की क्या बताया, बवाल मच गया है । महिला आयोग का कहना है कि बयान वापस लो। इस मामले में हम महिला आयोग के साथ हैं। अरे भाई सेक्सी कह देते मोदी जी, सेक्सी कहने का बुरा नही मनाती हैं आयोग की अध्यक्ष ममता जी। हेड लाईन भी करारी बनती "शशी थरूर की सेक्सी प्रेमिका" जो ब्याह के बाद इतनी सेक्सी हो गयी है कि कांग्रेस का कार्यकर्ता अपने को रोक नही पाया, थप्पड़ खा बैठा बेचारा। अनपढ़ रहा होगा, स्लट वाक नहीं देखा होगा। कि हम कम कपड़े पहने या कुछ ना पहने कितनी भी सेक्सी दिखे छूने की नही हो रही। खैर मेरा और शशी थरूर का ज्यादा गुस्सा इस बात पर है कि कीमत कम क्यो लगाई? आखिर कोई भी प्रेमिका या बीबी की कीमत उसका पति ही आंक सकता है। कोई गाड़ी या ज्वेलरी थोड़े है कि कोई कहे इतने की होगी यार।

 शशी थरूर ठीक कहते है कि बेशकीमती होती है। जो नही माने उसको वाड्रा से पूछ लेना चाहिये। उसका बियाह तो स्वयं सत्ता सुंदरी उर्फ़ प्रियंका गांधी से हुआ है। मोदी जी भी बेचारे बैचलर आदमी, यह सब खेला जाने तो कैसे। उनको क्या पता नाजुक क्षणों में पत्नी कितनी बेशकीमती हो जाती है। जो उसके मुख से निकले, आदमी आगे पीछे नही सोचता। डाईरेक्ट "यस माई लव" कहता है भाई। और ये मोदी जी भी न प्यार ही नही किये आज तक। लेकिन "प्यार में आदमी अंधा हो जाता है" यह मुहावरा तो सुने होंगे कि नही। अब देखो सुबोधकांत सहाय को भाई के प्यार में कोयला खदान दिलवा दिये, मंत्रीपद चला गया। संघ के मोहन भागवत से ही सीख लेते। गड़करी से प्यार है तो भाजपा का चाल चेहरा चरित्र सब घिया जाये। पर मजाल है कि इस्तीफ़ा कोई मांग ले। कांग्रेसियो को ही देख लो जीजा का इतना मोह है कि आरोप लगा नही सारे के सारे भिड़ गये बचाव में।। अब ये मोदी जी कहेंगे कि भ्रष्टाचार हो रहा है, देश लुटा जा रहा है। पर भाई प्यार तो प्यार है, उसमे आगा पीछा नही सोचा जाता है। और मोदी जी को भ्रष्टाचार रोकना है तो कानून बनाना होगा कि भ्रष्टाचार करे पति पर सजा हो पत्नी को। फ़ेर देखिये जैसे बीबीया सीबीआई से ज्यादा सतर्क हो जाती। फ़रमाईश करना तो भूल ही जाईये पति को भी गांधी वादी बना कर छोड़ेंगी।


 खैर साहब बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद वाली बात है। मोदी जी त दिन भर विकास, इनवेस्टमेंट, डेवेलपमेंट भजते रहते हैं। ऐसे आदमी के अंदर प्यार का अंकुर फ़ूटे तो भी कैसे। बयान दे दिया फ़ंसा गया देश का हर आदमी, सबकी जान सांसत में। कहीं हमारी प्रमिका या पत्नि अपनी कीमत न पूछ बैठे। कीमत उंची बताई नही कि उतनी उंची फ़रमाईश जड़ दी जायेगी।

 एक बात पर हम और उद्वेलित है, गड़करी जी बयान दिये हैं कि केजरीवाल डाईरेक्टर का नौकरी मांगने आया था। अयोग्य था, हम नही दिये तो आरोप लगा रहा है। केजरीवाल को पता होना चाहिये था कि गड़करी साहब पहले छोटा पोस्ट में लगाते है। ड्राईवर बनो, चपरासी बनो, धोबी बनो। काम देखा जाता है, आदमी पहचाना जाता है, तब न डाईरेक्टर बनाते है, उसके नाम से करोड़ो का इनवेस्टमेंट करते हैं। चले गये मुंह उठा के डाईरेक्टर बनने। गड़करी जी यह भी कहे कि केजरीवाल को विदेश से संदिग्ध पैसा आ रहा है। कुछ दिन पहले यही बात दिग्विजय सिंग भी कह रहे थे। केजरीवाल कह रहे हैं कि हमारा हिसाब आन लाईन है, चेक कर लो। काहे यह सब कहना भाई केजरीवाल? प्रेस कांफ़्रेस बुलाओ और जनता से कहो -"हां हम सीआईए से पैस ले रहे है, आईएसआई से भी ले रहे है। और देखो ये साले निकम्मे कांग्रेसी और भाजपाई हमको पकड़ नही पा रहे। ये इतना नकारे है कि जब मुझ जैसे वाट लगाने वाले राजनैतिक विरोधी को नही पकड़ सकते। तो किसी आतंकवादी, कालाधन वाले को कैसे पकड़ पायेंगे। देश वासियो हम बिना सत्ता मे आये सबकी पोल खोल रहे है सत्ता मे आयेंगे तो सोचो बेईमानो का क्या हाल कर देंगे। " खैर साहब कलयुग है, पता नही कैसे कैसे बयान सुनने को मिले आगे।

Monday, October 29, 2012

फ़िल्म चक्रव्यूह से नक्सल समस्या तक


प्रकाश झा की फिल्म चक्रव्यूह देखने की इच्छा बहुत दिनों से थी। नक्सल समस्या पर बड़े बैनर की यह पहली फिल्म है और इसे देखने के बाद भारत के नौजवानों के मन में कई सवाल खड़े होंगे। प्रकाश झा का कौशल इस फिल्म में नजर नहीं आया। इसमें बंबईया मसाला भरने की मजबूरी या जिद थी। या हो सकता है कि 'पानसिंग तोमर' देखने के बाद मेरी उम्मीदें इस फिल्म से ज्यादा ही बढ़ गई थी। खैर, इस फिल्म के समाप्त होने के बाद जब मैंने अपने पांच साल के बेटे से पूछा कि वह किसकी तरफ से लड़ेगा? उसने बिना देर के जवाब दिया कि कबीर की तरफ से। कबीर इस फिल्म में नक्सलियों की विचारधारा से प्रभावित हो जाने वाले किरदार का नाम है, जिसे अभय देओल ने अद्वितीय अभिनय से निखार दिया है। सर्वोत्तम अभिनय वह होता है जब अभिनेता किरदार के अभिनय को बिना लाग लपेट के कर दिखाए। ठीक पानसिंग तोमर में इरफान खान की तरह।

जबरदस्ती भरे गए किरदारो और सेक्स दृष्यों के बीच भी फिल्म उस विषय का भेद आम भारतीय के सामने खोलने में बहुत हद तक सफल रही है, जो विषय भारत की मीडिया देश हित के नाम से कवर नहीं करती। इस देश हित की आड़ में आदिवासियों के घर जंगल और पानी उद्योगपतियों को कौड़ियों के दाम बेचती छत्तीसगढ़ सरकार भी बच निकलती है और उड़ीसा की भी। भारत का आम नागरिक भी पुलिस के जवानों की लाशों को देख उन लोगों को बहुत नफरत और क्रोध के साथ देखते हैं जिन्हें नक्सली कहा जाता है।

आम आदमी का एक ही तर्क होता है कि जब लोकतंत्र है चुने हुए जन प्रतिनिधी हैं तब हिंसा का सहारा लेने की जरूरत क्या है। लेकिन भारत का लोकतंत्र उन इलाकों में जाकर खत्म हो जाता है जहां सरकारी विज्ञापनों से पलते पत्रकार नहीं जाते। जहां चुनावों में बकरा शराब बाट जीत जाने के बाद जनप्रतिनिधी नहीं झांकते। वे न इस बाजारवादी तंत्र के ग्राहक हैं और न ही उस महान देश के सम्मानित नागरिक जिसे इंडिया कहा जाता है। वे आदिवासी हैं। वे आदिवासी जिनके प्राकृतिक वनों को काटकर उन्हें इमारती लकड़ी के बंजर बागानों में बदल दिया गया। क्यों बदल दिया गया? क्योंकि उनके फल और फूल देने वाले पौधे न शहरी लोगों के फर्निचर में काम आ सकते थे, न पेड़ से तोड़ कर फल खाते आदिवासी के पास इस देश को देने के लिए कोई रेवेन्यू था। जाहिर है वहां विकास की जरूरत थी। वह विकास जिसमें शासन तंत्र से लेकर उसे वापस देने का सिस्टम बन सके। इसी लेन देन में तो अफसर और नेताओं की कमाई होती है।

वनों में इस बदलाव ने प्राकृतिक धन संपन्न आदिवासियों को कंगाल बना दिया। अपने जंगलों से भोजन ईंधन लेने पर अब वे चोर बन जाते है। और इस चोरी का खामियाजा पुलिस और वनविभाग के अदने कर्मचारियों की खिदमत से चुकाना होता है। यह खिदमत बेटी की इज्जत देकर भी की जाती है और मुर्गा देकर भी। लेकिन इतने से ही विकास कहां होता है भला! अब तो खदान-खदान खेलने को विकास कहते हैं। उन खदानों से नोट निकले तब न विकास टाइप का फील होगा भाई! अब इस विकास के लिए कुछ लाख लोगों को उनके घर से भगा कर उनके गांव नेस्तनाबूद करना पड़े तो कीमत कम ही है। लेकिन ये नक्स्लवादी देशद्रोही भी न पता नहीं कहां से आकर टपक गए। भोले भाले आदिवासियों को पट्टी पढ़ा दी। जल जमीन जंगल तुम्हारा है। मनमोहन सिंह या रमन सिंह के बाप का नहीं। खनिज खोदना है तो रेड्डी बंधु नहीं आदिवासी बंधु खोदेंगे। हथियार भी थमा दिए और विचारधारा भी। आप जंगल में आओ बेटा तब पता चले कि जब गरीब आदिवासी अपने घर को बचाने के लिए लड़ता है, तब कैसा युद्ध होता है। लेकिन अपने गृह मंत्रालय के मोटे-मोटे अफसर भी कोई कम थोड़ी थे। उन्होंने दूसरे आदिवासियों को हथियार थमा दिए बोला सलवा जुड़ुम करो। अब जाओ लड़ो साले आपस में आदिवासी ने आदिवासी को मारा कोई केस नहीं बनता। भला एक दलित दूसरे दलित को चमार कहे तो कौन जज सजा दे सकता है भाई।

अब साहब चल रहा है संग्राम, दिल्ली के सत्ता के गलियारों से हजारों प्रकाश वर्ष की दूरी पर। किसको कौन सी खदान मिलेगी उसका एमओयू पहले हो चुका है। दोनो तरफ के लोगों का स्टेक भी है। सलवा जुड़ुम में नोट और सत्ता की ताकत से लबरेज नेता है, तो नक्सलियों की तरफ भी लेव्ही से अरबों रुपए वसूलते नेता। और सरकार के अधिकारियों के पास भी अरबो का फंड आ रहा है आदिवासियों के विकास के लिए। सबका धंधा चमक रहा है, दिवाली में घर दमक रहा है, अब कुछ लोग तो मरेंगे ही न भाई इसको ही तो कोलेटेरल डैमेज कहते हैं। सिपाही मरे या नक्सल, मरता गरीब का ही बेटा है। कलेक्टर का अपरहरण हो जाए तो देश की सांसे थम जाती हैं, मीडिया खबरदार हो जाती है। पैसा देकर कुछ बंदी एक्सचेंज कर कलेक्टर घर आया नहीं कि फेर शुरू। इंडिया के सिटीजन तो बेचारे हर देश भक्त सिपाही की मौत पर आंसू बहा ही लेते हैं।

रही बात नक्सलवाद की तो अकूत धन कमाते होनहार सपूत की तरह हर नेता चाहता है, काश हमारे इलाके में भी हो जाता तो कितना अच्छा रहता।

Friday, October 19, 2012

नेताओं का सेक्सी फ़ैशन


देखिये साहब देश में पिछले कुछ दिनो से भंडाफ़ोड़ की बहार आयी हुई है।  लोग बाग जिधर देखो मुंह उठाये सरकारी दस्तावेजो और सबूतो के साथ आरोप पर आरोप पेले पड़े हैं। कल शरद पवरा की बिटिया सुप्रिया सुले जी ने अपने उपर लगाये गये आरोपों पर भड़क कर कहा कि आरोप लगाना फ़ैशन हो गया है। अब साहब किसी भी चीज के फ़ैशन बन जाने के लिये दो बाते जरूरी होती है। पहला यह कि लोग पीटे नही, आप ही देखिये सार्वजनिक जगह में पप्पी झप्पी लेना फ़ैशन नहीं बन पाया।  धर्मरक्षक लोग पीटने पहुंच जाते हैं। शादी शुदा भी हो तो क्या, जो करना है कमरे में करो जी,  समाज को मत बिगाड़ॊ। नेताओं पर आरोप लगाना भी पहले पिटाई खाने का इनविटेशन कार्ड ही था।  लेकिन नेता, अफ़सर अब मीडिया के विकास से परिचित हैं। ऐसे में पीटने के अंजाम वे जानते हैं। बस्तर के किसी गांव में निर्दोष आदिवासियो को गोलियो से भूना जा सकता है। लेकिन दिल्ली में केजरीवाल को महज धमकी देना गोरे चिकने आक्सफ़ोर्ड रिटर्न खुर्शीद का मुंह काला करवा सकता है।

दूसरी शर्त है कि आपके देखा देखी सबका उस बात कर करने को ललचाना। तो भाई केजरीवाल ने शुरू किया है,  अब सुनते है बहुत लोग के पर निकल आये है। वैसे बाबा के भी पर निकले थे,  लेकिन उ बेचारे धर्मशास्त्र के उपर अर्थशास्त्र के चढ़ बैठने के कारण थोड़ा बैकफ़ुट में आ गये हैं। पर जो भी हो सुप्रिया सुले की बात सिद्ध तो हो ही जाती है कि आरोप लगाना फ़ैशन बन गया है। कपड़ों का फ़ैशन पेरिस से चालू होता है। फ़ैशन टीवी(FTV) खोल कर हमने कई बार इस फ़ैशन को समझने की कोशिश की। लेकिन हैंडसम मर्दो को हम जलन के मारे देख नहीं पाते,  उनके कपड़े क्या देखें। सुंदरियो को देखने की कोशिश की थी। लेकिन साहब हिंदुस्तानी पत्नियों में फ़ैशन टीवी देखते पाये जाने वाले पति को पीटने का फ़ैशन है। सो एक बार के बुरे अनुभव के बाद हमने प्रयास कभी नही किया।

लेकिन नेताओं में जरूर फ़ैशन हो गया है कि  आरोप लगाने वाले को खुद भ्रष्ट करार देना।  यह सारे फ़ैशन कांग्रेस से शुरू होते है। भले उस समय कांग्रेस को बाकि नेता भला बुरा कहें हो। अपना नंबर आने पर इसी फ़ैशन को अपना लेते हैं। अब भाजपा को ही ले लीजिये, अंजली दमानिया को कहते है- "खुद सर से लेकर पैर तक जमीन घोटाला करती है और हमारे श्रद्धेय अध्य्यक्ष पर आरोप लगाती है"। सलमान खुर्शीद ने केजरीवाल को सड़क छाप कहा तो तुरंत फ़ैशन को अपना कर नितिन गड़करी ने चिल्लर करार दिया।

 लेटेस्ट ट्रेंड तो केजरीवाल को पागल करार देने का है। और साहब इस आरोप से तो हम अक्षरशः सहमत हैं। आखिर कोई पागल ही अपना काम धाम छोड़ के जान खतरे में डाल के सारे भ्रष्टो का भंडाफ़ोड़ करने मे भिड़ जाये। स्वराज्य और शुचिता के नाम से उस देश में वोट मांगे, जहां लोग धर्म और जात पर वोट देते हैं। एक और लेटेस्ट ट्रेंड भी आ गया है। आज कल सारे राजनैतिक दल स्लट वाक कर रहे हैं। उनका माडर्न लड़कियों की तरह कहना है कि हम कम नैतिकता ओढ़े या चाहे नग्न बेशर्मी दिखाये उसका मतलब हमारी हां नही है। केजरीवाल हमारा चीर हरण ना करे न ही हमारी बेईज्जती खराब करे, बताये देते हैं हां।

Thursday, October 11, 2012

सोलह में शादी की आजादी



देखिये साहब हमारा मुल्क रंगरंगीला परजातंतर है। इस बात को नित साबित करती खबरें हमारी मीडिया पेश करती रहती है। हालिया मामला है खाप पंचायत द्वारा लड़कियों को बलात्कार से बचाने, सोलह साल में उनकी शादी करने का फ़तवा। इस पर चारों ओर बवाला मचा हुआ है , हर कोई ऐसी भूरी भूरी आलोचना कर रहा है कि क्या कहा जाये। लेकिन इस फ़ैसले से कुछ लोगो को सहमत होना चाहिये। सबसे पहले संघ समर्थक जो बेचारे लव जेहाद से बेहद घबराये हुये रहते है कि मुसलमान हिंदु लड़कियो को पटा-पटा कर भारत को मुस्लिम राष्ट्र बनाने में तुले हुये हैं। अब लव जेहाद से हिंदु लड़कियो को बचाने का इससे बढ़िया रास्ता क्या हो सकता है कि उनके हाथ सोलह बरस की उम्र मे पीले कर दिये जाये। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी।दूसरी ओर मुल्लाओ को भी टीवी में दिखाना चाहिये, आखिर उनके अनुसार भी मुस्लिम लड़किया इस उम्र में ब्याही जा सकती है, कानूनन ब्याही जा भी रही है। लेकिन इन मुल्लाओं को टीवी पर दिखाने का कष्ट हमारी मीडिया नही करती। आखिर धर्मनिरपेक्षता भी तो कोई चीज है कि नहीं।

चलिये अब और आगे चले "तू सोलह बरस की मै सतरह बरस का" बाबी फ़िल्म के इस गाने और ऐसे हजारो फ़िल्मी गानो और फ़िल्मो पर भी बोलना नही चाहिये। आखिर प्रेम संवैधानिक वस्तु है। किसी भी उम्र में प्रेम करना, करने के लिये उकसाना संविधान सम्मत है। अब पढ़ा लिखा समाज किस तरह प्रेम के लिये मना कर सकता है।  लिंग वर्धक यंत्र का इश्तेहार अखबार में छपे या जापानी तेल का विज्ञापन एफ़ एम रेडियो पर।  यह तो पढ़े लिखे लोगो के लिये है। वो थोड़े इतने बेवकूफ़ है कि इन बातो मे आयेंगे। वैसे विज्ञापन तो बहुत ही गजब है।
पहली दूसरी से कहती है - "क्या बात है आशा जी आज बड़ी खिली खिली नजर आती है।"
दूसरी कहती है "क्या बताउं सखी, मेरे पति थके बुझे से रहते थे, राते बोझिल कटती थी। जब से उन्होने जापानी तेल लगाना शुरू किया है तब से मेरी राते रवां दवां हो गयी है।"

जिस वक्त खाप पंचायत के फ़ैसले को चैनल में कोसा जा रहा था। उसी वक्त ब्रेक में मैनफ़ोर्स कंडोम के विज्ञापन में उत्तेजक हाव भाव वाले लड़की लड़का अलग अलग स्वाद वाले कंडोम में जीवन का मजा चखने की दावत दे रहे थे।‘

अब वापस आ जाईये खाप पंचायत के फ़ैसले पर। उसको लेने के पीछे कारण क्या थे? तर्क क्या थे? इसकी जहमत किसी ने नही उठाई। इन बढ़्ती बलात्कार की घटनाओ के पीछे सबसे बड़ी वजह इश्क मुहब्बत का ग्रामीण परिवेश में चढ़ता बुखार है। प्यार में फ़ंसा कर बिगड़ैल लड़के, लड़कियो से संबंध स्थापित कर रहे है। और अतिरेक की घटनाओ में जिसमे कुछ अभी हरियाणा में हुई है। वे अपने मित्रो को भी एश करने की सामूहिक दावत दे रहे हैं। फ़िल्मो विज्ञापनो के बाजारवाद ने सुदूर अंचलो तक अपनी पैठ बना ली है। शिक्षित परिवार के युवक युवती और ग्रामीण अंचल के अनपढ़ या कम पढ़े लिखे युवाओ पर इसके असर में बड़ा अंतर है। इस बाजारवाद के प्रभाव से ग्रामीण अंचलो या शैक्षिक रूप से पिछड़े इलाको मे दूरगामी असर हो रहे है। बलात्कार से भी आगे गरीब लड़कियो को प्रेम के जाल मे फ़सा कर ही वेश्यालयो तक पहुंचाया जाता है। ऐसा नही है कि ऐसी लड़कियो का प्रेम हरदम असफ़ल होता है  लेकिन तुलनात्मक रूप से असफ़लता और बुरी संभावनाओ की दर इनमे बहुत ज्यादा है।

किसी भी संगठित समाज का अपने में आई खामियो और खतरो से निपटने का एक सामाजिक तरीका होता है। खाप इसी का एक उदाहरण है। हम आरामदेह कुर्सियो में बैठ इनके फ़ैसले को जरूर कोस सकते हैं।  सोलह या पंदरह की उम्र मे शादी निश्चित ही एक अनुचित कदम भी होगा। पर हमें खाप पंचायतो के सम्मुख खड़ी समस्याओं और आशंकाओ पर भी तो चर्चा करनी चाहिये। सभ्यता तो लिव इन रिलेशन तक भी ले जाती है, पर एक नौकरीशुदा उच्चशिक्षित जोड़े के लिव इन और खेतों, कारखाने में काम करते अल्पशिक्षित जोड़े लिव-इन रिलेशन में अंतर होगा कि नही। बाजारवाद की शक्तियां ही किसी भी देश के संविधान और व्य्वस्था को निर्धारित करती है। सो इस समस्या का कोई समाधान तो हो ही नही सकता। न खाप का निर्णय माना जा सकता है और न ही फ़िल्मो और विज्ञापनो के बढ़ते असर को रोका जा सकता है। पर कम से कम टीवी में बैठ खाप को सिर्फ़ कोसने के बजाये पूरे हालात पर निष्पक्ष चर्चा करना तो चाहिये। 

Wednesday, October 10, 2012

वाड्रा जीज्जा को बचाओ कांग्रेसियो





साहब हिंदुस्तान एक गजब मुल्क है , घटनाये भी अजब घटती है। हालिया मामला सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा का है। दामाद बाबू दुलरू अपनी ससुराल में बराबर फ़िट हो चुके थे। पिता भाई से भी संबंध इस बात पर ही टूटा कि वे गांधी परिवार के नाम से आसानी से मिलने वाले पैसे का मोह नही छोड़ सके थे। यहां तक तो दामाद बाबू ठीक चले लेकिन 2006 आते आते दामाद बाबू के अंदर महत्वकांक्षाये जाग उठी थी। पैसे उनके पास थे नही और अवसर स्वर्णिम नजर आ रहा था। ऐसे में उन्होने जो तथाकथित खेल किये वैसा खेल राजनीति का ककहरा पढ़ चुका कोई समझदार एमएलए भी नही करता, और दस साल व्यापार चला चुका कोई व्यापारी भी। किसी भी पत्रकार की लाईफ़ टाईम स्टोरी बनने या किसी भी राजनैतिक दल का लांच पैड बनने के लिये इनका शिकार काफ़ी था। मुझे तो लगता है कि पिछले दस साल महामूर्खो के सफ़ल होने का दशक था। फ़र्जी दस्तावेजो के आधार पर भारी कमीशन खिला खदान लेने वाले कोयला चोर हों। या चेक से कमीशन लेने वाली कणिमोझी। ए राजा हो या कलमाड़ी आज सारे पछता रहे हैं। ऐसा ही किस्सा राबर्ट वाड्रा का भी कहा जा सकता है।

2007 में कुल पचास लाख रूपये के साथ बनी कंपनी शुरू की, उसके बाद शुरू हुआ डीएलएफ़ एवं अन्य तीन कंपनियो से मुफ़्त पैसे मिलने का सिलसिला। जिसमे डी एल एफ़ ने 80 करोड़ दिये। इसमें भी केमिकल लोचा है, बोले तो कंपनियो ने इसे अपनी बैलेंस शीट में बिजनेस एडवांस दिखाया है और वाड्रा बाबू ने लोन। इसके बाद वाड्रा ने डीएलएफ़ के पैसो से उसकी ही जमीने फ़्लैट और होटल मे हिस्सेदारी खरीदी।  2007-8 से पचास लाख रूपये में शुरू हुई पांच कंपनियो से वाड्रा जी ने साठ लाख रूपये सालाना तंख्वाह भी प्राप्त की। और लोन के रूप मे मिले हुये पैसो को अज्ञात जगहो मे फ़िक्स डिपाजिट कर ढाई करोड़ ब्याज भी प्राप्त कर लिये। उसके बाद जादुई शक्तियो ने उनकी संपत्तियां 7.95 करोड़ वर्ष 2008, Rs 17.18 करोड़ वर्ष 2009, Rs 60.53 करोड़ वर्ष 2010 में पहुंच गयी। बोले तो 350 गुना की बढ़ोतरी तीन सालो में। लेकिन 2010 में उन्होने अज्ञात स्त्रोत से तीन करोड़ का नुकसान दिखा दिया। अब सोचने वाली बात यह है कि इस तरह तो उनकी लागत पचास लाख और कमाई ढाई करोड़ शून्य हो गयी। और इस पूरे दौरान उनकी किसी कंपनी ने कोई कार्य नही किया उनके पास कोई कर्मचारी भी नही था।

अब सवाल यह उठता है कि राबर्ट वाड्रा जी पर लगे आरोपो क्या जांच होगी, कौन जांच करेगा? क्या उन पर कोई कार्यवाही की जा सकती है? रे कांग्रेस के महारथी उन्हे बचाने के लिये अंग्रेजी के लफ़्जो का प्रयोग कर रहे हैं। जिसमे पहला शब्द है प्राईवेट , बोले तो कांग्रेसियो के हिसाब से वाड्रा एक गैर राजनैतिक शख्स है जो किसी भी सरकारी ओहदे मे भी नही। दूसरा शब्द आ रहा है "क्विड प्रो को-quid pro quo" सरलता से कहा जाये तो फ़ेवर के बदले में फ़ेवर। कांग्रेस का कहना है कि DLF की मेहरबानियो के बदले वाड्रा जी किसी भी तरह की सरकारी मेहरबानी करने की स्थिती मे नही थे या उन्होने नही की। इसलिये उन पर कोई भी अपराध का आरोप नही लगाया जा सकता। और ना ही जांच के दायरे मे आते है। हद से हद उनसे इनकम टैक्स वसूला जा सकता है जिसे चाहे आवेदन दे कर इनकम टैक्स विभाग से जांच करवा ले। पर अंग्रेजी का एक और वाक्य इन दलीलो को धाराशाही कर देता है। वह है "पालिटिकली एक्सपोस्ड पर्सन।" बोले तो राजनितिक परिवार से नजदीकी संबंध रखने वाला आदमी। विश्व के विकसित देश में यह कानून है कि किसी भी नेता अधिकारी का पुत्र आदि यदि संपत्ती या लाभ प्राप्त करते है तो उन्हे भी अपराधी ठराया जा सकता है। हमारे देश मे यह कानून नही है, पर सुप्रीम कोर्ट के विद्वान जज साहेबान दिन भर विश्व भर के कानूनो का हवाला दे कर फ़ैसले सुनाया ही करते है और वे यदि आरोप साबित समझे तो वाड्रा जी को भी मुजरिम ठहराया जा सकता है।
कांग्रेस के महारथी आरोप लगाने वालो को अदालत जाने की नसीहत भी दे रहे है। लेकिन फ़िर तो ऐसे मे दिन भर एक दूसरे पर आरोप लगाने वाले नेतागणॊ को इसे आचरण पर भी उतारना चाहिये क्योंकि भारत की राजनीति तो टिकी ही आरोप लगाने मे है। उससे भी बड़ा तर्क आता है नैतिकता का। लेकिन नैतिकता हमारे देश को त्याग कर जा चुकी है। सो उसकी बात करना ही बेमानी है, वरना यहां मंत्री बनने लायक नेता खोजे नही मिलेंगे। डैमेज कंट्रोल मे जुटी कांग्रेस काफ़ी डैमेज तो हो ही चुका है। राजनैतिक रूप से छिछालेदर झेलने के अलावा भी कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर लगा यह धब्बा आसानी से मिटने वाला नही है। उनके लिये राहत की बात यही है कि प्रियंका गांधी इन किसी भी कंपनियो मे किसी भी रुफ मे शामिल नही रही।

इस खुलासे से एक और बहुत बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि जब पिछले साल इकानामिक टाईम्स ने इस घोटाले के बारे इशारा करती स्टोरी छापी थी। तब उसके बाद भाजपा और भारत की मीडिया ने इस विषय को क्यों नही उठाया। क्या भाजपा और मीडिया समूहो को अपनी पोल भी खुल जाने का डर था।  पर अब एक ऐसा नया संगठन इस मैदान में आ चुका है, जिसका दामन साफ़ है और वह इन सबकी पोल खोलने में आमदा है। यदि केजरीवाल अपने कार्य में सफ़ल हो जाये, तो इस देश के सामने ऐसे सैकड़ो नग्न सत्य सामने आने वाले हैं। जिसे हर देश वासी जानता तो है पर उसकी बात बोलने वाला आज तक कोई नही था।
शाबास केजरीवाल आगे बढ़ो, हर देशभक्त आपके साथ है। और वाड्रा जी बाकी त सब ठीक है पर आप राजनीति मे मत आना, ऐसा कच्चा खेल करने वाला नेता तो इस देश को डुबा ही देगा प्रभु।

Sunday, October 7, 2012

माफ़ कर दो वाड्रा जीज्जा


हा केजरीवाल, ये क्या कर डाला भाई, युगो युगो से इस धरा पर जीजाओं को सर माथे पर बैठाया जाता है। आज आपसे वाड्रा जीजा  का फ़लना फ़ूलना ही न देखा गया।  अरे जीजा कमाता है, त दीदी और भांजा भांजी को ही न खुश रखता है।  उनको तमाम सुख सुविधाये प्रदान करता है।  खुद तो जीजा के लिये कभी कुछ किये नही,  डीएलएफ़ वाले बेचारे जीजा को काम धंधे से लगा दिये त आपका पेट दुख रहा है।  भाजपाई बोलते हैं कि  जीजा होगा कांग्रेसियो का हमारा नही है। पर ये हिंदुत्व की अवधारंणा वसुदैव कुटुंबकम को भूल रहे हैं। अरे जब पूरा विश्व कुटुंब है त कांग्रेसी भी न इसी कुटुंब मे आते है। और उनका जीजा भी त आपका जीजा हुआ कि नही। ऐसे शाखा में गला फ़ाड़ के गायेंगे  "सर्वे भवन्तु सुखिनः" और कांग्रेसियों का जीजा सुखी हो रहा है तो देखिये साहब ये दुखी हो रहे हैं।

और बाबा रामदेव भी लगे हैं आरोप लगाने,  ऐसे तो स्वदेशी, स्वदेशी गाते हैं। जीजा स्वदेशी कंपनी से स्वदेशी लोन लिया, जमीन भी स्वदेश में ही लिया,  फ़्लैट भी। कालाधन  छुआ भी नही, जिससे लिये लौटती डाक से वापस दे दिया। अब काली जमीन काला फ़्लैट का बात आज तक बाबा बोले हों त कोई कहे।   चलो ये केजरीवाल और बाबा रामदेव तो नये लोग है राजनीती में।  ये वामपंथी तो पुराने है इनको समझ नही आता कि जीजा ने कितना मासूम सा खेल किया है।  स्व. नरसिम्हा राव के लडके कि तरह  पांच % कमीशन लेकर अमेरिकियो को यूरिया की पेमेंट एडवांस में करवा देते।  वे पईसा लेकर रफ़ू चक्कर हो जाते तब क्या करते ?  जब श्रीकांत वर्मा का लड़का देश की खुफ़िया जानकारी बेच सकता है, तो जीजा जी तो क्या से क्या कर सकते थे।  हवाई जहाज से लेकर टैंक तक, जिधर हाथ रख देते वही माल खरीद लिया जाता।  फ़ेर रहते एड़ी अलगा अलगा के भाषण देने में। ऐसे भी आज कल वामपंथियो की सुनता कौन है साहब।

और मै देश वासियो से भी पूछना चाहता हूं  कि बेटी जब विदा होती है तो गाना गाते हो  कि नही "बाबुल की दुआएं लेती जा"। लोग चिंतित रहते है कि पता नही ससुराल वाले कैसे रखेंगे। वाड्रा जीजा ने त अपना मायका, बाप, भाई सब त्याग दिया। ऐसे त्याग शील दामाद के लिये तो जो किया जाये सो कम है। ऐसा हीरा घरजमांई किस्मत वालो को ही मिलता है भाई। और जीजा तो शराबी, जुआंरी भी निकल जाये तो लोग दीदी और बच्चो के भविष्य की खातिर बर्दाश्त करते है।  ये जीजा तो देश को राजकुमार राजकुमारी देने वाला है भाई।  आखिर अपना अमूल बेबी तो कुवांरा बाप बनने से रहा।

आखिर में चलते चलते-  "हे वाड्रा जीजा,  जो हुआ उस पर मिट्टी डालो।  कहा सुना माफ़ कर दो, आप तो जानते ही हो बदमाशो का गांव अलग से नही होता, हर गांव मे रहते है। ऐसे ही आपके कुछ बुरे साले भी है इस देश में।  ऐसे दुष्टो की बातो का क्या बुरा मनाना, आपके सलमान खुर्शीद टाईम कितने जीजा भक्त साले भी तो इसी देश में हैं। जो आपके लिये जान, आन- बान देने को सदा तैयार रहते है। आप पर इन बेशर्मो ने जो आरोप लगाये है उसके बचाव मे देखिये तो कैसे सब कूद पड़े है। मै आपका दर्द समझ सकता हूं आपने जो अपने को बनाना ससुराल मे मैगो दामाद बताया है उससे आपकी पीड़ा जाहिर है। पर आप भी बात समझ ही गये होंगे आखिर ससुराल गेंदा फ़ूल जो ठहरा।



नोट - वाड्रा को जीजा मानने से इंकार करने वाले दुष्टो , तुम्हारे न मानने से का होता है?  आखिर शोएब मलिक भी तो सानिया मिर्जा को उड़ा ले जाने के बाद जीजा बन ही गया था कि नही।

Thursday, September 13, 2012

हाय हिंदी हाय हाय हिंदी


बार में भाई दीपक भाजपायी बियर का घूंट भरते हुये बोले- " यार हिंदी के गिरते स्तर से मैं बहुत दुखी हूं। " बाजू में बैठे सोहन शर्मा उर्फ़ कांग्रेसी ने भी सहमति में सुर मिलाया।  हमने दाये बायें देख कहा - " मियां गजब करते हो,  कोई सुन लेता तो जान जाता कि आप दोनो एक ही थैली के चट्टॆ बट्टे हो।" दोनो ने एक सुर में जवाब दिया- "देश हित के मामलों में हम एक हैं।" हमने कहा - " वाह, हम तुरंत जाकर तमिलनाडु, केरल, आंध्रा जैसे राज्यों में जाकर सूचना दे देते हैं कि अब से काम हिंदी में ही होगा।  संसद में इस बात पर दो तिहाई बहुमत हो गया है।"  शर्मा कांग्रेसी ने तुरंत विरोध किया- " दवे जी, हमने हिंदी के स्तर को उपर उठाने की बात की है,  राज्यों मे हिंदी में काम करने की बात नही की है।"  हमने कहा - "मियां ये बात तुम्हारे बस में भी नही  है ,सिर्फ़ दीपक भाजपायी की पार्टी यह काम कर सकती है।"  

शर्मा जी भड़क गये -" बोले आप साबित कर के बताओ।" हमने कहा- "साबित कुछ नहीं करना है, ये लोग बोलते हैं कि जो भारत में रहता है वो हिंदू है, इसलिये जो भारत मे बोली जाती है वो हिंदी।  ये लोग मुस्लिम, इसाई, पारसी सब को हिंदू बोल सकते हैं तो कन्नड़, मलयाली और तमिल को भी हिंदी बोल सकते हैं। अब तो ये लोग हिंदू राष्ट्र का बड़ा वाला नक्शा भी बना लिये हैं। अब उर्दू, बर्मीस, थाई, सुमात्रन पता नही कितनी भाषायें हिंदी बन जायेगी। कांग्रेसी ऐसा उत्थान तो सौ जन्मो में भी नही कर सकते।"  दीपक भाजपायी भड़क गये- " दवे जी बात हिंदी  उत्थान की हो रही है और क्या क्या बड़बड़ा रहे हो, मुद्दे पर की बात करो। हमने कहा-  "भाई मेरे, बियर पीकर दुखी होने से तो हिंदी का उद्धार नही न होगा, यह होगा कैसे यह बताओ।"  शर्मा जी बोले - " हमारी सरकार ने राज कार्य में हिंदी भाषा के प्रयोग के लिये बहुत कुछ किया है। हमारी प्यारी मम्मी ने तो इटली की होने के बावजूद हिंदी में भाषण देना सीख लिया है।" हमने कहा- "शर्मा जी साठ साल हो गये भाषण पिलाते। आप तो बस स्विस बैंक में किस किस के खाते हैं यह सूची हिंदी में जारी कर दो ताकि आम आदमी पढ़ सके।" दीपक भाजपायी प्रसन्न हो कर बोले -"सही कहा दवे जी हम लोग हिंदी की शुद्धी को वापस लायेंगे और हिंदी को हिंदुस्तान की शान बनायेंगे।

" हमने कहा- " जाओ हिंद महासागर और अरब सागर के बीच दीवाल बनाओ पहले। दीपक भाजपायी बोले- "वो क्यों।"  हमने कहा- "भाई अरब सागर का पानी  हिंद महासाहर को दूषित कर रहा है कि नही। "  दीपक भाजपायी बोले- "यार आप बियर पीने के बाद बहक जाते हो,  पता नही क्या क्या बोलने लगते हो।" शर्मा जी ने बीच बचाव किया- "दवे जी बहस से क्या फ़ायदा, आप उपाय बताओ।" हमने कहा - "भाई किसी भी भाषा  का स्तर तभी उपर उठता है, जब उसमे नित नयी नयी उतकृष्ठ रचनाओ का निर्माण होता है। जिसे पढ़ने मे आम आदमी की रूचि जागती है। इस रूची से भाषा की मात्राओं और व्याकरण से भी आम आदमी परिचित होता है। दूसरी ओर भाषा तभी संमृद्ध होती है जब उसमें दूसरी भाषाओं के रोचक और वैज्ञानिक शब्दो का समावेश होता है। अब इसको भाषा का असमृद्ध होना बोलेगे तो फ़िर वही,  एक से एक कठिन शब्द जैसे रुद्धोष्म भित्ति, वेफशिकात्वीय तरंगें  का निर्माण करोगे। अव्वल तो विद्यार्थी इसका शब्दार्थ नही निकाल सकेगा सो रटन्तु विद्या का सहारा लेगा। और कालेज पहुंच गया तो फ़िर चारो खाने चित्त फ़िर अंग्रेजी के शब्द को समझो, रटो।"


   दीपक भाजपायी ने टांग अड़ाई - "दवे जी, अब आप तो यह भी कह दोगे कि उर्दू के शब्द भी मिला दो, आप तो हो ही क्षद्म  धर्मनिर्पेक्ष।  मौका मिला नही और पहुंच गये मुसलमानो को खुश करने।" हमने कहा- क्यों मिया उर्दू पैगंबर साहब ने बनाई थी कि मदीने में बैठ कर किसी ने लिखी थी।  भाई भाषा तो वही है, उसको पाकिस्तान में उर्दू बोले या हिंदुस्तान में हिंदी। पाकिस्तान के चैनल देखे होते तो पता चलता कि वहां प्रयोग होने वाले अधिकांश शब्द, मुहावरे  और व्याकरण तो पूरा हिंदी का हैं। भाषा बनाई नही जाती जनमानस जो बोलता है वह बन जाती है। उसमे सुधार साहित्यिक कृतियों से ही होता है, गायन से होता है। जगजीत सिंग को हिंदी सुर सम्राट कहते है कि उर्दू सुर सम्राट।  हिंदी फ़िल्में नही होती तो आज भी आधा देश हिंदी का ह नही जानता।" बात रिश्वत की तरह दीपक भाजपायी और सोहन कांग्रेसी के दिल में प्रवेश कर गयी। "


दोनो फ़िर एक सुर में बोले - "दवे जी आपका कहना सही है। हम दोनो मिल कर इस दिशा में प्रयास करेंगे।" हमने कहा- " वाह रे कलयुग के कालिदासों, जिस  डंगाल में खड़े हो उसे ही काट दोगे।" दोनो चट्टे बट्टॆ हैरानी से हमारी ओर देखने लगे, हमने समझाया- "भाई लेखकों का पेट भर जायेगा तो  सामाजिक विषमता, भ्रष्टाचार, धर्म के नाम पर राजनीति, देश के संसाधनो की लूट इन पर लेखो की बाढ़ आ जायेगी, लोग पढ़ेंगे तो जाग जायेंगे। मियां फ़िर देश की जनता आप लोगो को पीटेगी,  होश ठिकाने ले आयेगी,  सारी नेतागिरी उड़न छू हो जायेगी।"दोनो भाई सतर्क हो गये- "बात तो आप सही कह रहे हो दवे जी, तो किया क्या जाये।"  हमने कहा- करना क्या है भाई, सोहन बाबू आप बाबा ठग, अन्ना के साथी भ्रष्ट छपवाते रहो और दीपक बाबू तो लगे ही है नेहरू का दादा मुसलमान था,  लव जिहाद चल रहा है, हिंदू धर्म पर मंडराते खतरे। बस चैन की बंसी बजाते रहो और हाय हिंदी हाय हिंदी गाते रहो। जब मन ज्यादा दुखी हो जाये तो हमारे जैसे गरीब लेखको को कुछ खिला पिला दिया करो मन का बोझ भी हल्का हो जायेगा।"