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Sunday, November 25, 2012

कसाब की फ़ांसी गलत




देखिये साहब कसाब  दीन की राह में शहीद हो खुदा से हूरों को पाने के बिजनेस के सिलसिले में अवैध तरीके से भारत आया था। कितने लोग मरें इसका कोई एग्रीमेंट नहीं था, जितने मार सको उतने मारो।  किनारे उतरते ही मरता, कश्ती पलटने से मरता तो भी डील कायम रहती। सो पकड़ा जाने से भी उसके इस एग्रीमेंट में कोई फ़र्क पड़ने वाला नही था। सौदा तभी टूटता जब वो बुढ़ापे में अपनी मौत मरता।  प्रधानमम्मी सोनिया ने सब गुड़ गोबर कर दिया,  अपनी इमेज के लिये  उसको  शहीद बना दिया। अपना दुख  भाजपाई मित्र पर जाहिर किया तो वे भड़क गये- "पहले तो जान लो दवे जी, कसाब फ़ांसी से नही डेंगू से मरा है।   मच्छर भी कांग्रेसियों से देशभक्त  निकले ये तो बिरयानी खिला  रहे थे।" उनको बताया कि भाई फ़ांसी का वीडियो शूटिंग हुआ है, अब तक जन्नत में हूरों की डिलेवरी भी ले चुका होगा।" तो कहते है- "पहले दिन ही लटका देना था चौराहे में।  कोई हूर-वूर,  सब बकवास बात है।" हमने उनसे स्वर्ग और अप्सरा वाला मामला नही पूछा। फ़ोकट देशद्रोही सेकुलर का लेबल मिल जाता।

खैर मुस्लिम मित्र से पूछा तो बोले -" इस्लाम में  निर्दोष की, महिलाओं, बच्चो की जान लेने पर दोजख जाना पड़ता है।" हम कहें कि - "देखो मियां,  बेचारे कसाब को तो पता नही था ना ये।  बाद में कितना पछताया। वह तो बेचारा सच्चे दिल से खुदा की राह पर चलना चाहता था। दोजख तो उस मौलवी और हाफ़िज सईद को मिलेगी जिन्होने इसे बरगलाया था।" तो जवाब मिलता है कि मूर्खो को जन्नत नसीब नही होती। बुरे काम का बुरा नतीजा ही निकलता है।"

 वैसे देश में कसाब की फ़ांसी पर और तरह तरह की प्रतिक्रियाएं भी आ रहीं है। एक सुशील झा लिखते है- "किसी ने ट्विटर पर लिखा कि सोचिए बीस साल के बाद कसाब यरवदा जेल में सूत कात रहा होता और उस सूत से बना कुर्ता पाकिस्तान के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री को भेंट किया गया होता। सोचिए कि कसाब टीवी चैनलों पर सूत कातते हुए कहता कि मैं आज भी पश्चाताप कर रहा हूं अल्लाह मुझे माफ करें।....... सोचिए वो कितनी बड़ी नैतिक जीत होती भारतीय मूल्यों की पूरी दुनिया में."

 यह पढ़ते ही कानो में "रघुपति राघव" भजन बजने लगा। अहिंसा, शांती, प्रेम, दया...... आहाहाहा नारायण नारायण।  ऐसे उत्तम लोग आजकल मिलते ही कहा है। और अपना पड़ोसी पाकिस्तान तो अति उत्तम है। वो कितनो को  सूत कातने भेजेगा पता नहीं।  कसाब की बुनी खादी का कुर्ता पहने जनता के हितैषी नेता बड़े सेक्सी भी नजर आयेंगे।  आखिर जो देश कसाब पर दया कर सकता है वो अपनी जनता पर भी एक न एक दिन दया करेगा न भाई।  खैर बात वैसे बुरी नही आंख के बदले आंख वाली कबीलाई संस्कृती से उपर उठना भी चाहिये ही।  लेकिन इस उत्तम विचार को ट्वीटर पर चपकाने वाले महात्मा ने शायद इस बारे मे विचार नही किया होगा  कि भारत की गरीब जनता के पास खुद खाने को कुछ नही। दिल्ली के प्रेस क्लब मे हाफ़ रेट की महंगी व्हिस्  ी पीने और मुर्गा चबाने के बाद दयालु  हुआ जा सकता है।  पर सूखी रोटी चबाने वाले के मोबाईल मे "यह सुविधा आपको उपलब्ध नही है" का रिंग टोन बजने लगता है।

कई भाई जनता के सामने उन्माद परोसने की रोमन ग्लैडियेटरी संस्कृती का भी हवाला दे रहे है। तो एक सज्जन भारत फ़ांसी पाये लोगो मे नब्बे प्रतिश्त आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक होने का दावा कर रहे थे। एक दूसरे सज्जन जार्ज ओरवेल के हाथी के शिकार और कसाब की फ़ांसी में उचित संबंध जोड़ रहे थे।  हाथी ने "मस्त" की अवस्था में तोड़ फ़ोड़ की, आदमी को मारा था। कसाब ने "गुमराह" की अवस्था में यह किया था।  दोनो बुरी हरकतो के बाद शांत हो गये थे। सज्जन के हिसाब से उन दोनो को मारे जाने का कोई औचित्य नही था।"  दोनो को तमाशबीन जनता के दबाव में मार दिया गया था। हमने सोचा- ’अपना कसाब तो माफ़ी भी मांग रहा था,  हाथी ने तो माफ़ी भी नही मांगी थी। उसको तो और नही मारना था।"  खैर वो सज्जन मिलें तो हम पूछे- " भाई हाथी तो "मस्त" की अवस्था खत्म होने के बाद काम का, लाखों रूपये का था। कसाब तो "गुमराह" की अवस्था खत्म होने के बाद लाखो रूपया रोज  खर्च करवा रहा था,  दोनो में तुलना कैसी? लेकिन इसके बाद भी हम सहमत हैं कि कसाब और हाथी दोनो को मारना नही था। आखिर साले की डील पूरी हो गयी हूरे जो पा गया।


खैर घूम फ़िर के हम अपने एक अजीज मित्र के पास पहुंचे, अपना दुख बताया। वे ठठाकर हंसते हुये बोले -"यार दवे जी नाहक परेशान मत हो, कसाब जन्नत पहुंच भी जाये, हूरें मिल जाये तो भी टेंशन नही। देखो अगर नाक न हो तो सेंट किस काम का। वैसे ही सामान विशेष न हो तो हूंर किस काम की।" यह बात सुनते ही हमारी बांछे खिल गयी। वाह ये त हमारे भेजे में आया ही नही था अगर पा भी गया होगा तो भी पछताता रहेगा - हाय मै फ़ोकट आतंकवादी बन गया।"

Tuesday, July 31, 2012

मोहन भागवत अनशन पर क्यो नही ?



देखिये साहब वैसे तो इस देश में लोकतंत्र है,  न कोई किसी को अनशनियाने से रोक सकता है और न ही जबरदस्ती करवा सकता है। पर इस सवाल का कारण यह है कि सोशल मीडिया में स्वयं को हिंदु धर्म रक्षक मानने वाले वीर,  अन्ना हजारे के अनशन को कोसते घूम रहे हैं।  जाहिर है लोकतंत्र में उनको इसका अधिकार भी है, और ऐसा करने वाले वे अकेले भी नही है।  मीडिया के माध्यम से अनशन के खिलाफ़ राजनैतिक प्रचार निष्फ़ल है।  मीडिया और राजनैतिक दल दोनो अपनी साख खो चुके है। पर सोशल मीडिया में जहां से इस आंदोलन को जान मिलती है,  वहां एक  मुखर समूह संघ समर्थको का है। ये लोग अपने को देश भक्त, भारत मां के सच्चे सपूत और उनसे असहमत लोगो को देशद्रोही, बिकाउ और इन सबसे उपर शेखुलर करार देते है। इनका आरोप है कि अन्ना कांग्रेस के एजेंट हैं,  उनकी टीम चंदा खोर एनजीओ का समूह है। इनके हिसाब से इस आंदोलन में जाने वाला कोई भी व्यक्ति हिंदुत्व का दुश्मन है।

ऐसे मे सवाल यह उठता है कि  इन जैसे परम देशभक्तो के होते हुये क्या जरूरत है,  केजरीवाल और अन्ना को अनशन करने की। ये लोग जिस संघ और उसके प्रमुख आदरणीय मोहन भागवत जी के अनुयायी होने का दावा करते है।  वे क्यों नही भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन खड़ा करते, अनशन करते।  देशभक्त होने के दावे के साथ जुड़ी जिम्मेदारी का पालन भी जरूरी है कि नही। वैसे ये लोग  बाबा  रामदेव के आंदोलन को समर्थन करने का दावा करते है।  ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि बाबा के आंदोलन के समर्थन का क्या यह अर्थ है कि दूसरे के आंदोलन को पहले असफ़ल बनाया जाये।  संघ को किसी और को समर्थन करने के बजाये क्या खुद आंदोलन नही करना चाहिये था। आंदोलन भी छोड़िये, क्या भाजपा के भ्रष्टाचार के गर्त में डूबने की राह में संघ को रोड़ा नही बनना चाहिये था।  यह सवाल पूछते ही तड़ से बयान आ जायेगा,  संघ का भाजपा से कोई लेना देना नही, वैचारिक समर्थन है बस।  बाबा रामदेव असफ़ल हो जाये आंदोलन में, या फ़िर फ़रार हो जायें सलवार पहन के।  तब भी इनका यही बयान आ जायेगा कि बाबा को वैचारिक समर्थन मात्र है, उनसे लेना देना नही।


अरे भाई भाजपा से लेना देना नही, बाबा से लेना देना नही।  देश से तो लेना देना है कि उससे भी लेना देना नही। क्या हिंदु राष्ट्र की अवधारणा में इमानदारी, सुशासन नही आता। क्या भ्रष्टाचार से आपके महान हिंदु राष्ट्र के नागरिको का जीवन तबाह नही हुआ जाता। जिन आदिवासियो के ईसाई बनते ही बिलबिला उठते हो, उनके जंगल जमीन के लुटने से बिलबिलाहट क्यो नही उठती। जिन दलितो पिछड़ो को आप हिंदुत्व की मुख्यधारा मे जोड़ने का दावा करते हो उनके कष्ट से आपको सरोकार नही। और तो और जो शहरी मध्यम वर्ग आपका समर्थक वर्ग है उनके घरो मे बिना सब्जी का खाना बनता देख आंखो मे आंसू नही आता। या बड़े वाले हिदु राष्ट्र का नक्शा बनाते बनाते जो राष्ट्र अभी है उसकी तबाह होती अर्थव्य्वस्था दिखना बंद हो गयी है।


वैसे अंदर खाते की आफ़ द रिकार्ड बात आपको बताउं,  इनको अनशन में गांधी जी का भूत नजर आता है। वैसे गोड़से से तो कोई लेना देना नही है का बोर्ड लगाये रहते है। लेकिन गुप्त दान मे मिले नोट के आलावा जिस भी चीज में गांधी जी की छाया नजर आ जाये, उससे ये दूर छटक जाते है।  हमारी पहुंच इनके हेडक्वाटर तक नही है। वरना समझाये देते कि भाई गांधी का स्वदेशी चुराये कि नही, खादी चुरा लिये, दलित उद्धार चुरा लिये। यहां तक कि "हे राम" में से "राम"  भी चुरा लिये। तो काहे नही अनशन और चश्मा भी  चुरा लेते। चश्मा रहता तो हिंदु राष्ट्र  की हिंदु समस्याएं दिखती भी साफ़ साफ़। अनशन से देश भक्ती का काम करने का अचूक अस्त्र भी मिल जाता। पर नही भाई ये लोग जिद पर अड़े हैं कि  जनता के गुस्से का सहारा न ले अन्ना और केजरीवाल। उस पर सिर्फ़ और सिर्फ़ संघ और बाबा का अधिकार है। इनके लाये  ही देश  मे सुशासन आयेगा, खबरदार कोई और आगे बढ़ा तो।

संघ समर्थक, इस लेख को पढ़ कहेंगे-  मुसलमानो के बारे में कह के दिखाओ फ़िर हमको सीख देना। क्या कहूं भाई मै मुसलमान तो कछुए की तरह खोल के अंदर छिप कर बैठे रहते है। कोई आंदोलन हो  तो यह देखते है कि इससे हमारा क्या नुकसान हो सकता है। अपना फ़ायदा  देश का फ़ायदा तो उनके लिये सेकेंडरी इश्यू है। ठीक वैसे ही जैसे संघियो के लिये हिंदुत्व प्राथमिक और भ्रष्टाचार सेकेंडरी इश्यू है। संघी मुसलमानो का हवाला देंगे तो मुसलमान संघियो का। इनके आपसी रेस टीप के खेल में पिस यह देश रहा है। पिस वो लोग रहे है जो खुद को हिंदु या मुसलमान के पहले इंसान समझते हैं।

Wednesday, August 24, 2011

अन्ना गांधी का वध क्यों --- मनमोहन गोंड़से

नुक्कड़ पर यूरिया वाली चाय पीते समय हमने भाई सोहन शर्मा उर्फ़ कांग्रेसी से पूछा- " क्यों भाई शर्माजी आपके मनमोहन गोड़से इस अन्ना गांधी का वध क्यों करना चाहते हैं"। शर्मा जी भड़क गये-" यार दवे जी आप क्यों हर समय उसजुलूल बाते करते हो,  मनमोहन तो अन्ना की इज्जत करते हैं, और आप को क्या लेना देना, आप क्यों पूछ रहे हो"। हमने कहा भाई गोड़से भी इज्जत करता था,  उसने मारने के पहले गांधी जी के पैर भी छुये थे।  रही बात हमारी तो हम गोड़से जैसे इस बारे मे किताब लिखना चाहते हैं"। शर्मा जी भन्नायें- " कुछ हुआ ही नही है , और आप किताब लिखोगे"।  हमने कहा- "भाई ऐसा होने वाला है,  ऐसा नजर आ रहा है"।  "किताब लिखने वाले को घटना होने के पहले की परिस्थितियों और कारण के पर भी प्रकाश डालना होता है कि नही"।

शर्मा जी बोले-  "यार हमारा अन्ना से कोई बैर थोड़े ही है, हमें तो उनके अनशन के तरीके से और उनकी संसद को नींचा दिखाने की अवधारणा से बैर है"। हमने कहा - "गोड़से को भी गांधी जी से बैर थोड़े था,  उसको गांधी की विचार धारा और उनके अनशन के हथियार से ही बैर था"। "गांधी इसी अनशन से दंगे बंद करा देते थे, अपनी बात मनवा लेते थे"। "और गोड़से ने तो अपनी सोच में राष्ट्र भक्ति का ही काम किया था,  उसे लगा कि गांधी ने देश का बटवारा करवा दिया,  हिंदुओ का नुकसान किया तो उसने ये जघन्य कॄत्य कर डाला,  पर फ़िर भी अपने स्वार्थ में नही देश के स्वार्थ के लिये" ।" अगर गोड़से को कोई सही समझाने वाला मिलता तो वह अपनी देशभक्ती का सहीं प्रयोग करता,  पर आपका मन्नू , उसकी मम्मी और उस मम्मी के चालीस चोर तो देश भक्ति मे नही मम्मी भक्ति मे, निज स्वार्थ पूर्ती के लिये इस अन्ना गांधी को मारने वाले हैं"। "उनका अपराध तो अक्षम्य होगा"। " उस देशभक्त पर मूर्ख गोड़से को तो आज तक किसी ने माफ़ नही किया, आपके देशद्रोही और महा कुटिल मनमोहन गोड़से को तो युगों युगों तक मीर जाफ़र और जयचंदो की श्रेणी मे रखा जायेगा।
शर्मा जी ने तुरंत प्रतिवाद किया बोले, " हम तो परम पूज्यनींय, नित्य स्मरणीय बाबा साहब के सिद्धांतो और उनके बनाये संविधान का पालन कर रहे हैं"। मैने कहा- " उसी संविधान मे पीएसी के बारे मे व्यवस्था दी गयी थी,  क्या किया उसका आप लोगो ने,  मनमाने अध्यक्ष चुन लिया,  जोशी जी की रिपोर्ट खारिज कर दी,  वोटिंग करा दी क्या इसकी व्यवस्था थी,  आदरणीय़ बाबा साहब के संविधान मे"। शर्मा जी बोले, - " संविधान के अनुसार जिसका बहुमत हो उसी की बात मानी जाती है"। हमने कहा- " आज देश मे अन्ना का बहुमत है, जनलोकपाल बिल में क्यों नही मानते उनकी बात"।" क्यों शाहबानो प्रकरण मे संविधान बदल दिया था"।" क्या संविधान मे ये लिखा था,  कि आदिवासियों को उनके जंगलो से खदेड़ उसे सागौन और साल के जंगलो ने बदल दो,खदानो मे बदल दो। दलितों को खदेड़ उनकी जमीनो पर कब्जा कर कारखाने लगवा दो, बिल्डिंग तनवा दो"।

तभी दीपक भाजपायी बीच में कूद पड़े - "सहीं है दवे जी,  इस संविधान की तो कांग्रेस पार्टी मे धज्जियां उड़ा दी हैं"। हमने पूछा - "आप लोगो ने क्या किया,  और क्या कर रहे हो"।" पिछले गांधी को तो आप लोगो ने नकार दिया था,  आज तक उस भूल का खामियाजा भुगत रहे हो"।" अपनी अंटशंट किताबो से युवा समर्थकों का दिमाग तक खराब कर दिया है"। "आज मौका था भूल सुधार का,  पहले दिन से इस गांधी से बातचीत कर अपने अपने विचार सामने रखने का"  तो बाबाओं को,  यतियों को सामने कर दिया"।

"जनसैलाब तक उठता नहीं दिखा,  समझ में नही आया कि जनता सिर्फ़ कांग्रेस पार्टी से नही,  वरन पूरे सड़े हुये सिस्टम से त्रस्त आ गयी है"।" इस आल पार्टी मीटिंग का उपयोग कांग्रेस कैसे करेगी पता है आपको ? जैसे आप बाबा रामदेव के पीछे छुप सत्ता पाने पाने की सोच रहे थे, वैसे अब कांग्रेस  संसद के पीछे , संविधान के पीछे छुप इस गांधी को नकारने की सोचेगी। "जब उसे लगेगा कि मामला हांथ से बाहर जा रहा है,  तब तपाक से कूद कर इस गांधी को भी गले से लगा लेगी जैसे पिछले गांधी को लगाया था और साठ साल मलाई चाटी थी

"दीपक बाबू गोंड़से पैदा मत कर गांधी को पहचानो,  हिंदू हिंदू चिल्लाते हो तो जान लो गांधी ही हिंदू समाज के सबसे बड़े संत थे"। "जिन्होने पहचान लिया था कि इसी जातिवाद के कारण हिंदू समाज सदियों से हारता आया है"। "उन्होनें हरिजन उद्धार की जो मुहिम शुरू की,  उसी के कारण आज देश मे दलित मुख्य धारा में हिंदू समाज से जुड़ रहें हैं"। "वरना जितने पिछड़े थे, सब अपना धर्म बदल लेते,  आधे मुसलमान बन जाते , आधे इसाई और आप अपना राम राम भजते रहते"।


"खैर साहब खामखां इन मूर्खों को समझाने मे मैं अपना वक्त जाया करता हूं।  सालो बाद आज तो ये सही काम कर रहे हैं,  जनता जाग रही है"। "और ये भड़काने के लिये आग मे धी डाल रहे हैं"। "अच्छा है इस मनमोहन को गोड़्से बन जाने दें",  कम से कम ये मुर्दा कौम जाग तो जायेगी"। भगवान ने बड़ी मिन्नतों के बाद ऐसे मूर्ख सत्ताधारी और विपक्षी दल भेजे हैं। हमको भी सालो से तलाश थी भारत के मिखाईल गोर्बाचोव की"।