Sunday, February 27, 2011

अरूणेश आदिवासी हाजिर हो





कोर्ट मुहर्रिर की इस पुकार को सुनते ही ४ पुलिस वाले मुझे न्यायाधीश के केबिन मे सम्मान पूर्वक धकियाते हुये ले चले सम्मान पूर्वक इसलिये कि सारे विश्व की मीडिया मेरे केस पर ध्यान दे रही थी । धकियाते हुये इसलिये कि मै उन पुलिसियो की नजर मे उनके हमवर्दी भाईयो का कातिल था ।  अंदर पहुचते ही जज  सवाल किया  यह तो ब्राह्मण है फ़िर आदिवासी क्यो कहा जा रहा है सरकारी वकील ने कहा  मुकदमा सुनने के बाद आप समझ जायेंगे । इसके बाद आरोपो की सूची पढ़ी गयी  आरोप लगे राष्ट्रद्रोह के और न जाने क्या क्या तमाम आरोप  और दलीले सुनने के बाद जज ने विदेशो से आये प्रतिनिधियो को देखा जो न्याय की सत्यता परखने आये थे इसके बाद जज ने कक्ष मे सरकारी वकील को बुलाया ।


बूढ़े जज ने मेरी जवानी पर तरस खाते हुये आफ़ द रिकार्ड सरकारी वकील से कहा आरोप तो कोई साबित नही होते । जवाब मिला  माननीय  अपराधी शातिर है इसने बहुत  कम सबूत छोड़े थे  मै हूं कि केस खड़ा कर दिया वरना ये तो पाक साफ़ निकल जाता । जज बोले ये कोई बात नही हुई  सबूत कहां है फ़िर इसने हिंसा तो कोई नही की । वकील ने कहा  यह लेख लिख कर आदिवासियो को उन पर हुये अत्याचार और शोषण  समझाता है उनके जंगलो के राष्ट्रीयकरण और उनको इमारती लकड़ी के बागानो मे बदलने की सच्चाई बताता है । यह जानकर आदिवासी सरकार विरोधी होकर नक्सलवादियो के साथ  पुलिस पर हमला करते हैं ।  हिंसा भड़काने का आरोप तो निश्चित साबित होता है हुजूर । इस पर जज ने कहा देश मे अभिव्यक्ती का अधिकार सभी को है और फ़िर यह झूठ भी तो नही कहता है । अब मुझे तुम नक्सली साहित्य मिलने की कहानी नही बताना वो तो तुम्हारा बस चले तो मेरे पास से भी जप्ती दिखा दोगे ।  नही मै इस बेगुनाह को सजा नही दे सकता यह कह कर जज ने अपनी कलम नीचे रख दी ।


असहाय जज को सरकारी वकील ने करूणामयी आंखो से देखकर कहा  माननीय आपको विचलित होने की जरूरत नही है । अपराधी सिस्टम के विरुद्ध है ब्राह्मण कुल मे जन्म लेने के बाद भी दिन भर आदिवासी आदिवासी भजता रहता है। हमने इससे कहा कि लेख लिखो लेकिन केवल यह पांच लाईने लिखना छोड़ दो पर यह नही माना । इसे अच्छी शिक्षा मिली थी आराम से सरकारी नौकरी कर सकता था  ठेकेदारी या दलाली  कर के भी यह सिस्टम का फ़ायदा उठा सकता था यहां तक कि सरकार ने इसके उद्योग मे किसी भी अफ़सर को जाने से मना कर दिया था कि यह खूब पैसा कमाये और चुपचाप बैठे पर यह आदतन अपराधी है बाज नही आता और लिखना बंद नही करता पर अब यह नही बचेगा । मैं आपको एक संशोधित दोहा सुनाता हूं इससे आपको समझ मे आ जायेगा ।

सुनु मनुष्य कहउँ पन रोपी । बिमुख सिस्टम त्राता नहिं कोपी ॥
संकर सहस बिष्नु अज तोही । सकहिं न राखि सिस्टम कर द्रोही ॥



आप इसे आज छोड़ देंगे लेकिन सिस्टम नही छोड़ेगा सच्चे/झूठे सबूत जुटा कर देर सवेर इसे काल कॊठरी मे जाना ही है और नही तो इसकी सुपारी भी दी जा सकती  है । इसलिये हे न्याय शिरोमणी इसे सजा दीजिये । लेकिन जज के कंधे झुके हुये थे उसने कहा नही इसके छोटे छोटे बच्चे हैं मै यह पाप नही कर सकता । अगर जज होने पर मुझे बेगुनाह परिवारो को तकलीफ़ देनी पड़े तो इससे तो अच्छा मैं कोई और काम करके जीवन यापन कर लूंगा । मै अपने ही देशवासी  के साथ अन्याय नही कर सकता ।


अवसाद और शोक से ग्रस्त जज को देखकर वकील ने कहा हे न्यायप्रिय लो मैं तुम्हे दिव्यद्रुष्टी प्रदान करता हूं । देखो मुझे मैं स्वयं सिस्टम हुं । मैं ही कीचड़ के बीच कमल  बना फ़िरता  प्रधानमंत्री भी हू और और फ़ाईल सरकाने वाला चपरासी भी मैं ही  हूं । चापलूसी कर बना राष्ट्रपति भी मैं हूं और मै ही सिस्टम से बाहर जाकर आरोप लगाने पर माफ़ी मांगता विपक्ष का नेता  हूं । घूस खाकर जमीर बेचता नेता मै ही हूं और   जूठन खोजता कार्यकर्ता भी मैं ही हूं ।  मैं ही जमीने बेचता कलेक्टर भी हूं और  जमीने नापता  पटवारी भी ।मै ही घटिया  निर्माण करवाने वाला अभिंयंता भी हूं और मै ही करने वाला ठेकेदार भी । मैं ही सड़क पर खड़ा पैसा खाता हवलदार भी हूं और  स्विस बैंको मे पैसा जमा कराता सेनाध्यक्ष भी । मै ही पेड न्यूज छापते अखबार का मलिक  हूं  और  आफ़िस आफ़िस घूम कर चंदा मांगता पत्रकार भी मैं ही हूं । मैं ही घूस खाने वाला राजा भी हुं और खिलाने वाली प्रजा भी । भ्रष्टाचार करता अधिकारी भी मै हूं और उसकी जांच करने वाला अफ़सर भी मैं हूं । लोकतंत्र , तानाशाही हो या कम्युनिस्म काम मै ही करता हूं । जो मेरी सीमा मे रहता है उसका कॊई  बाल भी बांका नही कर सकता । इस कलिकाल मे मै ही राम हूं और मै ही महादेव भी मैं ही हूं  इसलिये प्रिय सुनो



सर्व धर्मान परित्यज्य मामेकं शरणं जजः ।

अहं त्वा सर्व पापेभ्यो मोक्षिष्यामी मा शुचः ।


भगवान सिस्टम के उस दिव्य रूप को देख और दिव्य वाणी कॊ सुन भय जनित श्रद्धा और अद्वितीय ज्ञान युक्त
जज ने तुरंत मुझे आजीवन कारावास की सजा सुना दी ।


सजा सुनते ही मैं बेहोश होकर  गिर गया आंखे खुली तो देखा बिस्तर के नीचे पड़ा था सामने पत्नी का चेहरा था एक दम अष्टमी की दुर्गा की तरह कपाल खप्पर लिये बोल रही थी दिन मे तो चैन से जीने नही देते रात मे भी आदिवासी जज भगवान वकील बड़बड़ा रहें हैं है जरूर किसी आदिवासी लड़की से टांका फ़िट हो गया है हे भगवान इस आदमी से शादी कर के मेरी जिंदगी झटक गयी है । हालांकि मैं आपसे सहमत हूं कि ऐसा लेखन ठीक नही पर क्या करूं राष्ट्रगान सुनते ही बिना लिखे रुका नही जाता ।

Wednesday, February 23, 2011

मरता किसान लाचार भगवान









सड़क मार्ग से धरती भ्रमण करते हुये,  माता पार्वती को एक घर से रोने पीटने की आवाज सुनाई दी। उन्होने भगवान शिव से पूछा- "प्रभू इस घर में क्या हुआ है।" पहले तो भोलेनाथ ने बात को टालने का भरसक प्रयत्न किया। पर उपाय न देख बोले - " इस घर के मुखिया ने, फ़सल बरबाद हो जाने के कारण आत्महत्या कर ली है।"  पार्वती जी ने विचलित हो प्रभु से कहा-  "ये तीन मासूम बच्चे अनाथ हो गये। उसकी बूढ़ी मां देखो तो कैसे तड़प रही है। पत्नी को तो होश ही नहीं- "हे कृपा के सागर महादेव,  इस आदमी को फ़ौरन जिंदा कीजिये।" प्रभु ने जवाब दिया- "प्रिये यह नही हो सकता।"  पार्वती जी गुस्से में आकर बोलीं- "क्यों नही हो सकता। आप स्वयं देवाधिदेव महादेव हैं। देखिये वो साधु चला आ रहा है। माया से उसके द्वारा इसे जिन्दा कर दें।"  भगवान ने कहा - "प्रिये बात समझो, ये कपटी साधु है। अगर मैने यह कर दिया, तो वह संत बन जायेगा।  जीवन भर आस पास के गांवो की बहू बेटियों कॊ गर्भवती करता फ़िरेगा। पाखंड करेगा सो अलग, इससे धर्म का नाश होगा।" माता ने कहा - "फ़िर इसे आप ऐसे ही जिंदा कर दें।"  भोलेनाथ बोले- "यह भी नही हो सकता। इसका पोस्टमार्टम हो चुका है।" माता ने कहा- "मुझे कुछ नही पता, आप इसे जिंदा करे बस।"


प्रभू ने गुस्से से माता को डांटना चाहा। लेकिन अचानक सामने महिला थाना के बोर्ड पर उनकी नजर गयी। नंदी ने भी पूछ हिलाकर उनको सतर्क किया कि इस बार माता की बात मानना ही होगा। अब प्रभू ने स्पष्ट जवाब दिया- प्रिये इसे हम  जिंदा कर भी दें तो भी यह बार बार आत्महत्या करेगा।  इसकी फ़सले बर्बाद होना ही हैं । इसकी जमीन उपजाऊ नही रही। इसकी फ़सलो में कीड़े लग जाते हैं। मौसम का समयचक्र बदलने से बेमौसम वर्षा या सूखा पड़ जाता है। इस पर माता ने कहा- "प्रभु ये सब समस्याएं तो आप चुटकी में दूर कर सकते हैं। फ़िर इसे आत्महत्या नही करनी पड़ेगी । प्रभु ने कहा- "प्रिये क्या आपने गीता नही पढ़ी।  अगर ईश्वर बिना कर्म किये ही सब कुछ कर दे। तो महाभारत ही क्यों होती। स्वयं कृष्ण ही पल भर में सारे कौरवों का नाश कर देते। और तो और इससे भीष्म और कर्ण जैसी महापुरूष का वध भी न होता ।


पर परम करूणामयी माता कहां मानने वाली थी। उन्होने कहा- "आप भी पांडव जैसे माध्यम से इस किसान की कौरवरूपी पीड़ा का शमन करें। जटाशंकर ने उदास भाव से जवाब दिया- "यही तो समस्या की जड़ है। मानव ने खेतो में कीटनाशक डाल।  बुरे कीटो के साथ साथ फ़सल मित्र कीटो का भी नाश कर दिया। उससे वे केचुए भी मारे गये। जो भूमी को पोला रखकर उसे उपजाउ बनाते थे । इसने मेड़ से सारे पेड़ काट कर उनकी पत्तियो से मिलने वाली प्राकृतिक खाद को खत्म कर दिया। और उन पक्षियो को भी उजाड़ दिया जो कीटो से इसकी फ़सल की रक्षा करते थे। इसने उन सब प्राणियो को मार दिया जो फ़सल से कुछ हिस्सा लेकर अपने मल से जमीन को उर्वर रखते थे। अब तो इन मूर्खो ने खेतो में शौच करना भी बंद कर दिया है। अब जब मल और पत्तियो की खाद नही मिलेगी तो जमीन की उर्वरता बनी रहेगी कैसे। इसने निर्झर बहती नदियो पर बांध बना दिये हैं। जब बाढ़ अपने साथ  नयी मिट्टी लायेगी नही। तो मै इसकी जमीन को उपजाउ बनांउ कैसे । इंसानो ने अंधाधुंध प्रदूषण फ़ैला कर मेरी बनाई हुई इस खूबसूरत धरती के प्राकृतिक संतुलन कॊ बिगाड़ दिया है। ऐसे मे समय पर वर्षा कराउ कैसे और असमय होने वाली बरसात रोकूं कैसे।  पहले अकाल से परेशान किसान जब मेरी अराधना करते थे। तो मै प्रसन्न होकर प्राकृतिक शक्तियों के माध्यम से उनकी पीड़ा दूर कर देता था, अब  मेरे हाथ बंधे हुये हैं । बात को समझिये  देखो यदी ये महिला थाना ही न हो। तो कोई पत्नी क्या अपने पति की पिटाई कर सकेगी ।


लेकिन ममतामयी माता  कहां मानती, बोलीं अच्छा- "आप उसको जिन्दा नही कर सकते। उसके परिवार के लिये तो कुछ कीजिये। किसी नेता मंत्री को इनके घर की राह दिखा सरकारी योजना का लाभ दिलावाईये।" भगवान महादेव ने कहा- "प्रिये, उससे भी कुछ होना जाना नही है। याद नही राहुल गांधी एक कलावती के इसी तरह विधवा होने पर उसके घर गये थे। ढेरो वादे किये गये थे, क्या हुआ?  कुछ समय पहले उसी कलावती के दामाद ने भी इसी तरह फ़सल बरबाद होने पर आत्महत्या कर ली है।" इतना सुनते ही माता ने गुस्से में आकर कहा- "आपको  करना धरना कुछ है नही  बहाने बस बनवा लो आपसे। ठहरिये मैं ही उन बेचारो के यहां हीरे जवाहरात से भरी मटकी रख आती हूं।" भगवान शंकर ने माता को बलपूर्वक रोकते हुये कहा- "क्या कर रही हो,  ऐसा मत करो। इनके घर में ये सब मिलेगा। तो थानेदार पकड़ लेगा। पैसा गया अलग, बेचारी की अस्मत लुट जायेगी सो अलग। माता ने कहा- "ऐसा कुछ नही होगा मैं स्वयं उसकी रक्षा करूंगी।" अब शंकर जी ने बड़े स्नेह पुर्वक समझाया- "प्रिये आपकी करूणा संसार में अद्वितीय है। पर बात को समझो। इनको इतना पैसा मिल जायेगा। तो ये भी बड़े महल बनायेंगे, बड़ी गाड़ियो में घूमेंगे। एसी में रहेंगे,  इससे प्रदूषण और फ़ैलेगा। क्या आप चाहती हैं कि  और २० किसान आत्महत्या करें?"  माता ने संयत होते हुये कहा- "नही नही मै ऐसा नही चाहती।" इस पर शंकर जी ने विजयी मुद्रा मे नंदी की ओर देख  आंख मारी। फ़िर गंभीर होते हुये माता से कहा- "सुनो प्रिये मैं इस किसान के तीनो बच्चो को वरदान देता हूं कि वे तीनो बड़े होकर महापुरुष बनेंगे।  इस धरा पर हो रहे विनाश को रोक, इस धरती पर पुनः प्रकृती की छ्टा बिखेर  मानव जाति का भविष्य सुरक्षित करेंगे। और जब तक इस धरा कि आयु शेष रहेगी। तब तक उनका नाम सदैव आदर से लिया जायेगा। यह सुनते ही हर्षित  माता ने तुरंत भगवान के डिनर के लिये उनके मनपसंद पकवान बनाने के लिये कैलाश का रूख किया और शिवजी ने चैन की लंबी सांस ली ।